खाली मन का कोरा पन्ना
खाली है मन बिल्कुल खाली
सर-सर जिसमें हवा गुजरती,
कभी अनल बन लपट सुलगती
नहर विमल सलिल की बहती !
मधुर गूंजता कलरव जिसमें
कभी पिघलते मधुरिम सपने,
झरे कभी पराग सुमनों से
स्वप्निल बहे फाग वृक्षों से !
रक्तिम आभा कभी झलकती
शीतल पावन अगन धधकती,
जल जाएँ इक-इक कर रोड़े
सुगम सुनहरी राह उभरती !
बरस-बरस नीले अम्बर से
मेघ तृषा बुझाते भू की,
बूंद-बूंद में लाते अमृत
बादल प्यास मिटाते जी की !
सहज प्रफ्फुलित रेशा-रेशा
खिली-खिली सी धरा सुहानी,
गहराई में तपन छुपी है
उसे सम्भाले शीतल पानी !
खाली मन का कोरा पन्ना
जिस रंग में चाहे रंग डालो,
केसरिया बन जले मशाल
एक क्रांति की लहर उठा दो !