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रविवार, जुलाई 1

खाली मन का कोरा पन्ना


खाली मन का कोरा पन्ना


खाली है मन बिल्कुल खाली
सर-सर जिसमें हवा गुजरती,
कभी अनल बन लपट सुलगती
नहर विमल सलिल की बहती !

मधुर गूंजता कलरव जिसमें
कभी पिघलते मधुरिम सपने,
झरे कभी पराग सुमनों से
स्वप्निल बहे फाग वृक्षों से !

रक्तिम आभा कभी झलकती
शीतल पावन अगन धधकती,
जल जाएँ इक-इक कर रोड़े
सुगम सुनहरी राह उभरती !

बरस-बरस नीले अम्बर से
मेघ तृषा बुझाते भू की,
बूंद-बूंद में लाते अमृत
बादल प्यास मिटाते जी की !

सहज प्रफ्फुलित रेशा-रेशा
खिली-खिली सी धरा सुहानी,
गहराई में तपन छुपी है
उसे सम्भाले शीतल पानी !

खाली मन का कोरा पन्ना
जिस रंग में चाहे रंग डालो,
केसरिया बन जले मशाल
एक क्रांति की लहर उठा दो !