रविवार, जुलाई 1

खाली मन का कोरा पन्ना


खाली मन का कोरा पन्ना


खाली है मन बिल्कुल खाली
सर-सर जिसमें हवा गुजरती,
कभी अनल बन लपट सुलगती
नहर विमल सलिल की बहती !

मधुर गूंजता कलरव जिसमें
कभी पिघलते मधुरिम सपने,
झरे कभी पराग सुमनों से
स्वप्निल बहे फाग वृक्षों से !

रक्तिम आभा कभी झलकती
शीतल पावन अगन धधकती,
जल जाएँ इक-इक कर रोड़े
सुगम सुनहरी राह उभरती !

बरस-बरस नीले अम्बर से
मेघ तृषा बुझाते भू की,
बूंद-बूंद में लाते अमृत
बादल प्यास मिटाते जी की !

सहज प्रफ्फुलित रेशा-रेशा
खिली-खिली सी धरा सुहानी,
गहराई में तपन छुपी है
उसे सम्भाले शीतल पानी !

खाली मन का कोरा पन्ना
जिस रंग में चाहे रंग डालो,
केसरिया बन जले मशाल
एक क्रांति की लहर उठा दो !


11 टिप्‍पणियां:

  1. खाली मन का कोरा पन्ना
    जिस रंग में चाहे रंग डालो,
    केसरिया बन जले मशाल
    एक क्रांति की लहर उठा दो !………………बहुत खूबसूरत भाव समन्वय्।

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  2. कोरे पन्ने पर आपने सभी रंग भर दिये।..वाह!

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  3. सहज प्रफ्फुलित रेशा-रेशा
    खिली-खिली सी धरा सुहानी,

    प्रफुल्लित कर रहा है आपका उत्कृष्ट काव्य....!!

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  4. वाह...

    बरस-बरस नीले अम्बर से
    मेघ तृषा बुझाते भू की,
    बूंद-बूंद में लाते अमृत
    बादल प्यास मिटाते जी की !

    बहुत सुन्दर अनीता जी.

    अनु

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  5. उल्लास और उमंग से भरे सुन्दर भाव...सादर

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  6. बरस-बरस नीले अम्बर से
    मेघ तृषा बुझाते भू की,
    बूंद-बूंद में लाते अमृत
    बादल प्यास मिटाते जी की !...बहुत सुन्दर भाव ..अनीताजी बधाई..

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  7. वन्दना जी, अनुपमा जी, देवेन्द्र जी, अनु जी, संध्या जी, व माहेश्वरी जी, आप सभी का आभार !

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  8. खाली मन.....काश हमारा भी हो जाये.....बहुत सुन्दर ।

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    1. इमरान, जरा ढूढें मन को.... कहाँ गया ? वह है ही नहीं....यही तो खाली होना है...इसी पल

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  9. क्रांति की लहर तो आपकी लेखनी से निकल ही रही है...

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  10. बरस-बरस नीले अम्बर से
    मेघ तृषा बुझाते भू की,
    बूंद-बूंद में लाते अमृत
    बादल प्यास मिटाते जी की !
    खूबसूरत.....

    बड़े दिनों बाद आना हुआ .....माफ़ी चाहूंगी...!!

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