शनिवार, अगस्त 28

बाल कविता

पेड़

मेरे घर के पिछवाड़े में
एक आम का वृक्ष खड़ा है,
अनगिन हैं शाखाएँ उसकी
लम्बा-चौड़ा तना बड़ा है I

जब वसंत का मौसम आता
बौरों से वह लद जाता है,
मधु की सी मीठी सुवास पा
भौरों का दल छा जाता है I

नन्हीं-नन्हीं अमियाँ लगतीं
कभी हवा सँग धरा पे गिरतीं,
खुशबू से कोयल आ जाती
मैं झट उनको चुन कर खाती I

तेज हवा में झूमा करते
पत्ते सन सन शोर मचाते,
वर्षा में कितने ही प्राणी
शाखों पर आके छुप जाते I

मई जून में फल पक जाते
उनको पेड़ स्वयं न रखता,
जग में सदा मिठास बाँटता
मन ही मन में हर्षित होता I

मेरा मन होता उदास तो
पेड़ साथ देता साथी सा,
कभी तने से सत्कर बैठूँ
झूला कभी झुलाती शाखा I

अनिता निहालानी
२८ अगस्त २०१०

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