मंगलवार, मई 27

रास रचाएं संग वनमाली

रास रचाएं संग वनमाली



चलो झटक दें हर वह पीड़ा
जो उससे मिलने में बाधक,
सभी कामना अर्पण कर दें
बन जाएँ अर्जुन से साधक !

चलो उगा दें चाँद प्रीत का
उससे ही करें प्रतिस्पर्धा,
या फिर अंजुरी भर-भर दें दें
भीतर उमग रही जो श्रद्धा !

चलो गिरा दें सभी आवरण
गोपी से हो जाएँ खाली,
उर के भेद सब ही खोल दें
रास रचाएं संग वनमाली !

11 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति बुधवारीय चर्चा मंच पर ।।

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  2. बहुत सुन्दर भक्ति और आध्यात्म का संगम !
    new post ग्रीष्म ऋतू !

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  3. बेहतरीन अभिव्यक्ति...

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  4. बहुत सुन्दर भक्ति भाव से ओत-प्रोत..

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  5. जब मैं था तब हरि नही , अब हरि हैं मैं नाहि । भक्ति की पराकाष्ठा इसी भाव में है ।

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  6. काफी दिनों बाद आना हुआ इसके लिए माफ़ी चाहूँगा । बहुत बढ़िया लगी पोस्ट |

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  7. रविकर जी, कालीप्रसाद जी, रश्मि प्रभा जी, वाणभट जी, माहेश्वरी जी, इमरान, गिरिजा जी, आशा जी व ओंकार जी आप सभी का स्वागत व आभार !

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