गुरुवार, मई 22

अनकहे गीत बड़े प्यारे हैं

आज एक पुरानी कविता 

अनकहे गीत बड़े प्यारे हैं

जो न छंद बद्ध हुए
बिल्कुल कुंआरे हैं
तिरते अभी नभ में   
गीत बड़े प्यारे हैं !

जो न अभी हुए मुखर
अर्थ क्या धारे हैं
ले चलें जाने किधर
 पार सिंधु उतारे हैं !

पानियों में संवरते
पी रहे गंध माटी
जी रहे ताप सहते
मौन रूप धारे हैं !

गीत गाँव की व्यथा के
भूली सी इक कथा के
गूंजते से, गुनगुनाते
अंतर संवारे हैं !

गीत जो हृदय छू लें
पल में उर पीर कहें
ले चलें अपने परों  
उस लोक से पुकारें हैं !


6 टिप्‍पणियां:

  1. अंतरात्मा में गूँज भरते गीत शब्दों की क्षमता से कहीं अधिक सार्थक और मार्मिक होते हैं.

    उत्तर देंहटाएं
  2. आपकी इस रचना को आज दिनांक २२ मई, २०१४ को ब्लॉग बुलेटिन - पतझड़ पर स्थान दिया गया है | बधाई |

    उत्तर देंहटाएं
  3. पानियों में संवरते
    पी रहे गंध माटी
    जी रहे ताप सहते
    मौन रूप धारे हैं !

    वाह बहुत सुंदर प्रस्तुति...

    उत्तर देंहटाएं
  4. ...बहुत ही सुन्दर प्रस्तुति !!

    उत्तर देंहटाएं
  5. प्रतिभा जी, तुषार जी, शिल्पा जी, सदा जी व कौशल जी आप सभी का स्वागत व आभार !

    उत्तर देंहटाएं