गुरुवार, मई 8

आना-जाना

 आना-जाना

न कोई किसी से दूर जाता है
न कोई किसी के पास आता है,
स्वयं से दूर और स्वयं के पास
हर मानव यहाँ आता-जाता है !

केंद्र से परिधि की यात्रा चलती है
दिन भर हलचल परिधि पर घटती है,  
निद्रा में केन्द्र पर विश्राम पाता है
थका हारा जब अपने घर जाता है !  

11 टिप्‍पणियां:

  1. यही आना और जाना जीवन है … गहन अभिव्यक्ति

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  2. मन तो सुकून अपने आँगन में ही पाता है ...सुन्दर पंक्तियाँ

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  3. घर का अपना ही सुकून होता है..सुन्दर पंक्तियाँ

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  4. पर चलते हुए ये समझ कहाँ समझ पाता है ? अति सुन्दर ..

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  5. sachmuch
    dooriyan aur nazdeekiyan to aabhaasi hain....
    tripti bhi to pyas ki hi pyasi hai...

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  6. mujhe lagta hai yeh doosri tippani hai jo phir aapki swikriti ke katghare mein khadi hai...

    agr tippniyan nirdosh sabit hon to mukt ki soochna avasya dein---

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  7. संध्या जी, संध्या शर्मा जी, रामकुमार जी, अमृता जी, प्रतिभा जी, ओंकार जी, मोनिका जी, माहेश्वरी जी, शालिनी जी आप सभी का स्वागत व आभार !

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