शुक्रवार, मई 2

पाने को सारा आकाश है

पाने को सारा आकाश है



खोने को कुछ भी नहीं यहाँ
पाने को सारा आकाश है !

जाने या ना जाने कोई
होती उसकी ही तलाश है !

मेघ उसी की गाथा गाते
होता पल्लवित पलाश है !

जोड़ तोड़ मन जो करता है
अक्सर होता वही निराश है !

प्रीत नीर भरते मनघट से
झर जाता भीतर प्रकाश है !

 उसको जिसने सौंप दिया सब
खो जाती हर एक आश है !


11 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी लिखी रचना शनिवार 03 मई 2014 को लिंक की जाएगी...............
    http://nayi-purani-halchal.blogspot.in आप भी आइएगा ....धन्यवाद!

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    1. बहुत बहुत आभार यशोदा जी

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  2. पाने को सारा आकाश है ....... बस यही याद रह जाये तो फिर क्‍या कहने
    बहुत बढिया

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  3. सुंदर सन्देश परक रचना..

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  4. सब- कुछ सौंप कर ही मन परम निश्चिंत हो सकता है - फिर और क्या चाहिये !

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  5. मन के भाव को शब्दों में लिखा है ...

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  6. इसी एक इश्वर को सब कुछ सौंप देना निश्चित हो जाना है ...

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  7. सदा जी, शिल्पा जी, रेवा जी, अमृता जी, प्रतिभा जी, संजय जी, ओंकार जी व दिगम्बर जी आप सभी का स्वागत व आभार !

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