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बुधवार, मार्च 25

प्रेम रहेगा कैसे मन में

प्रेम रहेगा कैसे मन में


जब ना कोई घर में रहता 

 तब चुपके से कान्हा आता, 

नवनीत चुरा मटका तोड़े 

गोपी का हर दुख मिट जाता !


द्वार खुला ही छोड़ गई थी 

निशदिन उसकी राह देखती, 

उसका होना ही बाधा था 

कैसे वह यह बात बूझती !


वह रहती या रहता कान्हा 

दोनों नहीं समाते घर में, 

नील गगन सा जो विशाल है 

प्रेम रहेगा कैसे मन में !


अलग कहाँ थी वह कान्हा से 

जैसे दिल के भीतर झाँका, 

वही प्रीत-संगीत, नृत्य था 

ग्वाल-बाल बना वही बाँका !




 

रविवार, नवंबर 10

गोपी पनघट-पनघट खोजे

गोपी पनघट-पनघट खोजे


सुंदरता की खान छिपी है 

प्रेम भरा कण-कण में जग के , 

छोटा सा इक कीट चमकता 

रोशन होता सागर तल में !


बलशाली का नर्तन अनुपम 

भीषण पर्वत, गहरी खाई, 

अंतरिक्ष अगाध गहरा है 

क़ुदरत जाने कहाँ समाई !


खोज रहे हैं कब से मानव 

महातमस छाया है नभ में, 

शायद पा सकते हैं उसको 

धरित्री के भीतर अग्नि में !


नटखट कान्हा छुप जाता ज्यों 

गोपी पनघट-पनघट खोजे, 

उसके भीतर छिपा हुआ है 

घूँघट उघाड़ वहीं न देखे !


रस्ता भटक गया जो राही 

भटक-भटक कर ही पहुँचेगा, 

गिरते-पड़ते, रोते-हँसते 

अपनी भूलों से सीखेगा !


शनिवार, मई 23

वह

 वह

भूल कर भी दिल से वह जाता नहीं 
बिन बुलाये घर में जो आता नहीं 

गूँजती है धुन उसकी बांसुरी की 
जय के नगमे जो कभी गाता नहीं 

भर रहा चुपचाप ही कई झोलियाँ 
उससे बढ़कर दूसरा दाता नहीं 

गोपियों से पूछकर जरा देख लो 
बिन गोविंदा ब्रज जिन्हें भाता नहीं 


मंगलवार, मई 27

रास रचाएं संग वनमाली

रास रचाएं संग वनमाली



चलो झटक दें हर वह पीड़ा
जो उससे मिलने में बाधक,
सभी कामना अर्पण कर दें
बन जाएँ अर्जुन से साधक !

चलो उगा दें चाँद प्रीत का
उससे ही करें प्रतिस्पर्धा,
या फिर अंजुरी भर-भर दें दें
भीतर उमग रही जो श्रद्धा !

चलो गिरा दें सभी आवरण
गोपी से हो जाएँ खाली,
उर के भेद सब ही खोल दें
रास रचाएं संग वनमाली !