मंगलवार, सितंबर 22

जीवन ! कितना पावन !

जीवन ! कितना पावन !

सदा अछूता ! कोमल शतदल
सरवर में ज्यों खिला कमल हो,
राजहंस या तिरता कोई
दूर गगन तक उड़ सकता हो !

नन्ही बूंद ओस की जैसे
इन्द्रधनुष या पंख मयूर
कोमलतम या प्रीत हृदय की
बाल रवि का अरुणिम नूर !

निर्मल नभ की शुभ्र नीलिमा
मंद पवन वासन्ती या फिर,
रुनझुन हल्की सी पत्तों में
कलकल मद्धिम धारा का स्वर !

तुलसी दल की गंध सुहानी
श्वेत मालती की ज्यों माला,
मन्दिर में जलता दीपक या
मोती से जो बहे उजाला !



6 टिप्‍पणियां:

  1. सत्य के बिलकुल सटकर
    बहुत उम्दा
    हिंदी को सिखने के लिए आपको पढ़ना बहुत जरूरी सा लगता है।

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  2. बहुत ही सुंदर !! पावन से भाव ..!!

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  3. निर्मल नभ की शुभ्र नीलिमा
    मंद पवन वासन्ती या फिर,
    रुनझुन हल्की सी पत्तों में
    कलकल मद्धिम धारा का स्वर !

    बहुत खूबसूरत चित्रण.

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  4. आपकी रचना पढ़ कर ऐसा महसूस हुआ कि किसी पावन हवा की खुशबू छू कर गुज़र गयी हो...अद्भुत

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  5. रोहितास जी, अनुपमाजी,रचना जी और कैलाश जी आप सभी का स्वागत व आभार !

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