मंगलवार, सितंबर 1

कान्हा की हर बात निराली

कान्हा की हर बात निराली  




यमुना तट पर वृंदावन में
पुष्पित वृक्ष कदम्ब का सुंदर,
अति रमणीक किसी कानन में
जिस पर बैठे हैं मधुरेश्वर !

पीताम्बर तन पर धारे हैं
चन्दन तिलक सुगन्धित माला,
मंद हास से युक्त अधर हैं
कुंडल धारे वंशी वाला !

गोपों ग्वालों संग विचरते
गउओं ने जिनको घेरा है,
राधा प्रिय गोपी जन वल्लभ
जिनके उर सुख का डेरा है !

कालिय नाथ नथा सहज ही
गिरधर मोहन माखन चोर,
जिसने मारे असुर अनेकों
जन-जन बांधी उर की डोर !  

बादल भी रुक कर सुनते हैं
कान्हा की मुरली का गीत,
हिरन, मयूर चकित हो तकते
थम जाता कालिंदी नीर !

5 टिप्‍पणियां:

  1. सुन्दर व सार्थक रचना ..
    मेरे ब्लॉग की नई पोस्ट पर आपका स्वागत है...

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  2. दिल को छूती बहुत ही मनभावन अभिव्यक्ति..बहुत सुन्दर

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  3. शांति जी, कैलाश जी व रचना जी आप सभी का स्वागत व आभार !

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  4. बहुत मानवीय लगता है कृष्ण का जीवन. इसीलिये कान्हा बहुत प्रिय हैं मुझे.

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