शनिवार, मार्च 14

टूट जाते हैं स्वप्न

टूट जाते हैं स्वप्न

स्वप्न देखा है मानव ने

 न जाने कितनी-कितनी बार

लायेगा चिर स्थायी शांति

इक दिन वह

स्वर्ग से धरा पर उतार

चैन की श्वास लेंगे जब जन

 बहेगी प्रीत की बयार.. 

नहीं चलेगा, मौत का सामान

बेचने वालों का कारोबार

चाहता रहा है यही दिल उसका

 देता रहा है यही पुकार

खत्म होगा वैर, साथ

होड़ भी हथियारों की

 सहज, सुंदर बढ़ेगा जीवन व्यापर

नहीं पनपेंगे षड्यंत्र सत्ताओं के लिए

न ही भेंट चढ़ेंगे हिंसा की, निर्बल

विजय होगी सौहार्द की 

जीतेंगे ज्ञान और बल !

बनेगा नव समाज श्रम से

नहीं होगा अभाव न भूखा कोई

खिलेंगी सभी प्रतिभाएं

 नहीं खो जाएँगी अभावों के मरुथल में

स्वप्न देखा है मानव ने

यह हजारों बार

पर टूट जाते हैं स्वप्न

और हकीकत

बहुत ज़ोर से तमाचा लगाती है 

मानवता मुँह बायें खड़ी देखती रह जाती है ! 


12 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों के आनन्द में रविवार 15 मार्च, 2026 को लिंक की जाएगी .... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा ... धन्यवाद!

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  2. सुन्दर स्वप्न, शायद कभी पूर्ण हो जाये

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    1. यदि ऐसा हो तो कितना अच्छा होगा वह समाज, स्वागत व आभार शालिनी जी!

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  3. आदर्श स्वप्न टूटते हैं
    सुन्दर रचना

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    1. जी, जब तक मानव नहीं जागता, स्वप्नों की हक़ीक़त यही है,स्वागत व आभार!

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