शुक्रवार, जुलाई 10

शिवालय

शिवालय 


कोई कहता है 

शिव के भीतर प्रेम है 

जैसे कि शिव और प्रेम हों

 दो अलग-अलग वस्तुएँ 

असल में प्रेम ही शिव है  

जब भीतर जागता है प्रेम 

मन ख़ाली हो जाता है 

सारे भेद मिट जाते हैं 

श्वासें गढ़ती भीतर 

वह मंदिर

 जिसमें शिव विराजमान होते
पूरक देह में स्थान बनाती  

रेचक मन की थिरता को दृढ़ करती 

पूरक है आत्मा का जीवन

रेचक संसार का 

दोनों के मध्य 

शिव का वास है 

जो उसमें जागेंगे 

वे जानेंगे !

 

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