सोमवार, मार्च 23

वासंतिक नवरात्र आ गये

वासंतिक नवरात्र आ गये 


माँ के आने की बेला है 

घर में मंगल कलश बिठाओ,

धूप-दीप, फूलों से स्वागत  

 द्वारे बंदनवार सजाओ ! 


माँ जो भीतर कण-कण में हैं 

गहरी अंतर प्यास जगाओ, 

प्राणों का आधार वही हैं 

देवी माँ का ध्यान लगाओ ! 


क्षुधा रूप में, भक्ति रूप में 

शिव शक्ति और शांति रूप में, 

मन की बात कहे बिन सुनतीं 

माँ हैं दिल की गहराई में !


वही सप्त चक्रों में बैठी 

चिंतन, सृजन, प्रेम की देवी 

वही ज्ञान की देवी बनकर 

अंतर को सद्प्रेरित करतीं !


माँ के रूप हज़ारों चाहे 

मन में कोई रूप बसाओ, 

वह अनंत की राह दिखायें 

जीवन में समरसता लाओ !




 

3 टिप्‍पणियां:

  1. जय माँ अंबे 🙏 भक्तिभाव पूरित सरस सुंदर वंदन

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  2. यार, ये कविता पढ़कर सच में मन शांत हो जाता है। आपने माँ को सिर्फ पूजा तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उसे अंदर की शक्ति और भावना से जोड़ा है। हम अक्सर बाहर ढूंढते हैं, लेकिन असली जुड़ाव अंदर ही मिलता है। शब्द सरल हैं, पर असर गहरा है।

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