गुरुवार, अप्रैल 16

आँगन में उतरा हो जैसे

आँगन में उतरा हो जैसे



साँझ-सवेरे जब उपवन में, पंछी गाये पीहू-पीहू  

आँगन में उतरा हो जैसे, फूला, खिला बोहाग बीहू !


आया बसंत, हर मन उत्सुक, स्पंदित होकर जागी धरती 

भोर कभी या संध्या बेला, सुनी दूर से थाप ढोल की !


मन आतुर हो उठे हैं सारे, कदम थिरकने को तैयार 

पंछी, पशु सभी हुए शामिल, कपो फूल की छायी बहार  !


नदियों, पोखर में गायों को, लेप लगाकर स्नान कराते 

सब्ज़ी, फल, हरी घास दे, नयी रस्सी, नव घंटी दिलाते !


तिल, गुड़, चावल के पकवान, स्वादु अतीव घर-घर में बनते 

नये साल का स्वागत करने, आशीर्वाद बड़ों के लेते 


 गमसा बाँधे, बीहु नाचते, बालक, युवा सभी गलियों में 

नयी पोशाक पहन निकलते,  स्वागत हुआ ताम्बुल,पान से


हरे साग-सब्जियाँ पकाती, माँ का काम बहुत बढ़ जाता 

दुनिया भर में इस उत्सव का, अब हर कोई नाम जानता 


कुदरत के इस मधु उत्सव में, रंगाली बीहू के किस्से 

 तय हो जाते जीवन भर के, आँखों ही आँखों में रिश्ते 



 

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