गुरुवार, अप्रैल 9

भव सागर का कूल किनारा

भव सागर का कूल किनारा


 परम एक था ! निपट अकेला 

उपजा जिससे जगत पसारा, 

 ढूँढ रहा हर कोई जिसमें 

भव सागर का कूल किनारा ! 


 दिखता नहीं दूसरा कोई

कितना खोजा युगों-युगों से। 

 बना जीव वही, वही आत्मा 

खुद को ढूँढे है सदियों से !


कैसा आना, कैसा जाना, 

 बसा हुआ है जो कण-कण में, 

कैसे हुआ अनेक एक से 

बिना किसी भी उपादान के !


 बोध आत्मा का करें किस विधि

कहाँ उस आनंद को पाएँ, 

  उपजी है जिस स्रोत से सृष्टि

कैसे लौट वहाँ घर जायें !

 

1 टिप्पणी:

  1. "बोध आत्मा का करें किस विधि

    कहाँ उस आनंद को पाएँ,

    उपजी है जिस स्रोत से सृष्टि

    कैसे लौट वहाँ घर जायें "!
    वाह! समस्त जीवन का सार तत्व!!!

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