गणपति उत्सव
श्रीगणेश कारण हैं सबके
मिट्टी, गोबर से भी रच लो,
दूर्वा का तिनका कर अर्पण
छोटा सा मोदक ही धर दो !
बहुत सरल, शुभता के दाता
कर्ण विशाल व आँखें गहरी,
ज्ञानी, बली नृत्य भी जानें
सब कलाओं के हैं पारखी !
एक मुक्त आकाश की भाँति
गणपति प्रेम का बाना ओढ़े,
सुखकर्ता, दुखहर्ता, पालक
बन कर आते अतिथि अनोखे !
लोक चेतना में बसते हैं
एक अनूठा हर्ष जगाते,
भेद भावना तज कर सारे
छोटे-बड़े सभी मिल गाते !
मोदक भाते गणनायक को
है आमोद-प्रमोद प्रिय जिनको,
घर, दुकान कहीं भी बसा दो
विशालकाय, शुभ तुंडकाय को !
गजमस्तक मुख सबसे सुंदर
लंबोदर औ" मूषक वाहन,
अद्भुत अति सिखावन उनकी
साधें हर हाल में संतुलन !
खुलकर, हँसकर, गाकर जीओ
पाठ सिखाते सहज प्रेम का,
हर नेत्र में अश्रु होते जब
समय आ गया हो विदा का !
सर्जन और विसर्जन दोनों
जीवन में सदा संग विचरते,
गणपति उत्सव यही सिखाता
मिट-मिट कर हम पुनः जन्मते !

बहुत सुंदर बप्पा को बहुत अच्छी लगे की यह कविता 🥰🪷
जवाब देंहटाएंस्वागत व आभार प्रियंका जी!
हटाएंआपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" बुधवार 16 सितंबर 2026 को साझा की गयी है......... पाँच लिंकों का आनन्द पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!
जवाब देंहटाएंबहुत बहुत आभार पम्मी जी!
हटाएंवाह
जवाब देंहटाएंस्वागत व आभार !
हटाएंबेहतरीन
जवाब देंहटाएंस्वागत व आभार !
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