गणपति उत्सव
श्रीगणेश कारण हैं सबके
मिट्टी, गोबर से भी रच लो,
दूर्वा का तिनका कर अर्पण
छोटा सा मोदक ही धर दो !
बहुत सरल, शुभता के दाता
कर्ण विशाल व आँखें गहरी,
ज्ञानी, बली नृत्य भी जानें
सब कलाओं के हैं पारखी !
एक मुक्त आकाश की भाँति
गणपति प्रेम का बाना ओढ़े,
सुखकर्ता, दुखहर्ता, पालक
बन कर आते अतिथि अनोखे !
लोक चेतना में बसते हैं
एक अनूठा हर्ष जगाते,
भेद भावना तज कर सारे
छोटे-बड़े सभी मिल गाते !
मोदक भाते गणनायक को
है आमोद-प्रमोद प्रिय जिनको,
घर, दुकान कहीं भी बसा दो
विशालकाय, शुभ तुंडकाय को !
गजमस्तक मुख सबसे सुंदर
लंबोदर औ" मूषक वाहन,
अद्भुत अति सिखावन उनकी
साधें हर हाल में संतुलन !
खुलकर, हँसकर, गाकर जीओ
पाठ सिखाते सहज प्रेम का,
हर नेत्र में अश्रु होते जब
समय आ गया हो विदा का !
सर्जन और विसर्जन दोनों
जीवन में सदा संग विचरते,
गणपति उत्सव यही सिखाता
मिट-मिट कर हम पुनः जन्मते !

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