सोमवार, नवंबर 5

हर जगह है हाथ कोई


हर जगह है हाथ कोई

बेसुरी न बांसुरी हो
शहद जैसी माधुरी हो,
जिंदगी यह कीमती है
ज्यों कमल की पाँखुरी हो !

प्रीत सुर भीतर जगे
शांति का उपवन उगे,
बोल जो भी सहज फूटें
चाशनी में हों पगे !

सत्य जब आकार लेगा
सहज सब स्वीकार होगा,
जो थे हम वह ही दिखें
बस यही संदेश देगा !

गूँजता अस्तित्व सारा
ज्योतियों से तमस हारा,
हर जगह है हाथ कोई
राह दे, देकर सहारा !

21 टिप्‍पणियां:

  1. सत्य जब आकार लेगा
    सहज सब स्वीकार होगा,
    जो थे हम वह ही दिखें
    बस यही संदेश देगा !....बहुत सुन्दर भाव..

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    1. माहेश्वरी जी, स्वागत व आभार !

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  2. आपकी उम्दा पोस्ट बुधवार (07-11-12) को चर्चा मंच पर | जरूर पधारें |
    सूचनार्थ |

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    1. प्रदीप जी, बहुत बहुत आभार !

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  3. बहुत ही खुबसूरत और प्यारी रचना..... भावो का सुन्दर समायोजन......

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  4. सत्य जब आकार लेगा
    सहज सब स्वीकार होगा,
    जो थे हम वह ही दिखें
    बस यही संदेश देगा !
    - यही है ईमानदारी !

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    1. प्रतिभा जी, वाकई यही ईमानदारी है यही सहजता है..

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  5. गूँजता अस्तित्व सारा
    ज्योतियों से तमस हारा,
    हर जगह है हाथ कोई
    राह दे, देकर सहारा !

    लाजवाब रचना .... :)

    आपके ब्लॉग पर आकर काफी अच्छा लगा।मेरे ब्लॉग पर आपका स्वागत हैं।अगर आपको अच्छा लगे तो मेरे ब्लॉग से भी जुड़ें।धन्यवाद !!

    http://rohitasghorela.blogspot.in/2012/11/blog-post_6.html

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    1. रोहितास जी, आपका स्वागत है, आपके ब्लॉग पर जाकर मुझे भी खुशी हुई.

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  6. सत्य जब आकार लेगा
    सहज सब स्वीकार होगा,

    बहुत ही सुंदरा पंक्तियाँ......शानदार ।

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  7. आपकी सुन्दर प्रेरक लयबद्ध रचना बहुत पसंद आई जिसकी लिए आपको बहुत बहुत बधाई

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    1. संगीता जी, आपकी टिप्पणी हाजिर है, बहुत-बहुत आभार !

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  9. यही भरोसा ही भव पार कराता है..

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  10. इमरान व राजेश जी, आपका स्वागत व आभार!

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  11. बहुत सुंदर रचना ! एकदम ताज़गी भरी !:)
    ~सादर

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  12. भावों से परिपूर्ण अभिव्यक्ति

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  13. अंतस को स्पर्श करते एक एक शब्द...बहुत सुंदर अभिव्यक्ति...

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  14. मीता, अंजू जी, व कैलाश जी स्वागत व आभार !

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