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गुरुवार, अप्रैल 30

पशुपतिनाथ सहायक बनते

पशुपतिनाथ सहायक बनते


पशु की नाईं रहता सोया 

असुर यही चाहे मानव से, 

मानव ने साधा है पशु को

बँधा हुआ जाने किस भय से !


बंद रहे घर के बाड़े में 

बस उतने घेरे में घूमें, 

 दूर ले गई रस्सी जितना 

बनी फाँस जो पड़ी गले में !


तन को रोटी मिल जाये बस 

 विचारों की जुगाली मन को,

ज्ञात हुए को फिर-फिर जाने 

 पुन: भोगता भोगे हुए को !


जब संतति ने दी सुविधाएँ 

उनके पीछे पीछे चलता, 

जहाँ नहीं समर्थ वे निकलीं 

अपनी क़िस्मत रहे कोसता !


‘मैं’ की रस्सी पड़ी गले में 

‘मेरे’ का दायरा बनाया, 

अविश्वास का विष है भीतर 

भय से भरा हुआ मन रहता !


या आँखों पर पड़ा आवरण 

या सुविधाओं का प्रलोभ है, 

मद, पाखंड, दिखावा मन में 

झूठमूठ  ही  करे  योग है !


पशु की नाईं जीवन जिसका 

पशुपतिनाथ सहायक बनते, 

वही माँगते हविष अहम् का 

 अंतर पावन भी वह करते !


रविवार, नवंबर 2

पाया नहीं पार कुछ

पाया नहीं पार कुछ 

खूब मथा, बिलोया खूब
निकला न सार कुछ 

दूध नहीं पानी था !! 

खूब धुना, काता खूब
निकला न धागा कुछ 

कपास नहीं काठ था !!

खूब ढूँढा खोजा खूब
निकला न माल कुछ 

चाँदी नहीं सीप था !!

खूब डरा उछला खूब
 ना था आधार कुछ 

साँप नहीं रस्सा था !!

खूब चला दौड़ा खूब
गया पर कहीं नहीं 

आत्मा नहीं अहम् था !!

खूब पढ़ा सुना खूब
पाया नहीं पार कुछ 

बुद्धि नहीं मन था !!