मंगलवार, अप्रैल 28

ठहरा मन उपवन प्रशांत है

ठहरा मन उपवन प्रशांत है 


छायी भीतर नीरव छाया 

 कब बिगाड़ पाती कुछ माया, 

ठहरा मन उपवन प्रशांत है 

छाया में विमल एकांत है !


उहापोह न शेष रही चाह 

मिली हरियाले वन में राह, 

छल-छल छलकें सोते जल के

बरस मेघ नीर नेह ढलके ! 


 भीतर छायी नीरव  छाया 

 कुछ बिगाड़ पाती कब माया,

मौन मुखर हो उस छाया में 

कहीं सुर वीणा, मृदंग बजे !


 नाद अनोखा अनुपम प्रकाश 

मिल जाये, है जिसकी तलाश, 

थम श्वास मंत्र कोई गाये 

कुदरत का हर रंग लुभाये !



 


 

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