ठहरा मन उपवन प्रशांत है
छायी भीतर नीरव छाया
कब बिगाड़ पाती कुछ माया,
ठहरा मन उपवन प्रशांत है
छाया में विमल एकांत है !
उहापोह न शेष रही चाह
मिली हरियाले वन में राह,
छल-छल छलकें सोते जल के
बरस मेघ नीर नेह ढलके !
भीतर छायी नीरव छाया
कुछ बिगाड़ पाती कब माया,
मौन मुखर हो उस छाया में
कहीं सुर वीणा, मृदंग बजे !
नाद अनोखा अनुपम प्रकाश
मिल जाये, है जिसकी तलाश,
थम श्वास मंत्र कोई गाये
कुदरत का हर रंग लुभाये !
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