बुधवार, जून 3

सीधे सच्चे - कुछ दोहे



सीधे सच्चे - कुछ दोहे


जीवन इक पहेली है,  बूझ ले सो ज्ञानी

सपनों सा संसार है, आँख खुलते फानी

 

हवा, धूप, माटी, गगन,  या अनल की मूरत

अंतर में जो झांक ले, दिखती वही सूरत

 

चिंता, लालच, डाह, मोह, मन के ये विकार 

तज कर उस की शरण ले, उतरे सागर पार

 

बीता जो वह कब रहा, भावी से अनजान

जो पल अपने सामने, उसकी कीमत जान

 

यह जग एक सराय है, पक्का नहीं मुकाम

आना-जाना अटल है, रहने का ना काम

 

सूरज, धरती से मिला, रश्मि कर फैलाये

वसुधा कातर प्रेम से, अश्रु ओस बहाए 


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