तेरा-मेरा भेद हुआ कब
तू सिंधु, मैं बूँद हूँ तेरी
तू सूरज मैं किरण सुनहरी,
तू संपूर्ण समष्टि, मैं व्यष्टि
तू बोध विशुद्ध हूँ मैं दृष्टि !
तू व्यापक, मैं तेरा वंश
शांति अनंत, प्रेम का अंश,
तेरी ही धुन मुझमें बजती
चहूँ पहर है तेरी मस्ती !
यह जग तेरी ही माया है
अहंकार तेरी छाया है,
जान लिया रहस्य यह जिस ने
सरस संग निशदिन पाया है !
तुझ संग उठता और बैठता
तुझ संग जगता व सोता है,
सारा जग जब पाया भीतर
बाहर क्या उसका खोता है !
भीतर ही तो तू मिलता है
कण-कण, पोर-पोर खिलता है
अब न कोई दूरी कहीं है
इक दूजे में ही बसता है !
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