बूंद बूंद में वही झरे था
एक नदी सागर से उपजी
एक नदी सागर से बिछड़ी,
पर्वत की चोटी से उतरी
गुफा, कन्दरा होती बहती !
जाने कितनी बाधाएं थीं
कितने अंध मोड़ आये थे,
कितना जल खो गया राह में
गहरी घाटी के साये थे !
मार्ग बनाती, तृषा बुझाती
नदी निरंतर बढ़ती जाती,
सागर
का कुछ पता नहीं था
अनजानी मंजिल थी भाती !
लेकिन उसको भान नहीं था
सागर हर पल उसे भरे था,
वर्षा में झर-झर अम्बर से
बूंद बूंद में वही झरे था !
वही दिशा देता था उसको
चाहे वह अनजान थी इससे,
हिम शिखरों से वही बहा था
नादां वह अनभिज्ञ थी इससे !
उसको स्वयं पर मान बड़ा था
नीर मधुर अति है यह मेरा,
मुझसे ही फसलें लहरातीं
यह जग सदा ऋणी है मेरा !
सागर निशदिन बना साक्षी
बूंद बूंद में भरता अमृत,
नदिया, झील, कूप, सरवर में
बसता छुप के सदा जागृत !
आखिर इक दिन ऐसा आया
जा पहुंची सागर के द्वारे,
महामिलन जिस घड़ी घटा था
मिला वहाँ शत भुजा पसारे !
तब जाकर सब भेद खुला था
सागर ने ही उसे रचा था,
सृष्टि कर्म चलाने हेतु
बस उसको सम्मान दिया था !
