शनिवार, जुलाई 14

बूंद बूंद में वही झरे था


बूंद बूंद में वही झरे था

एक नदी सागर से उपजी
एक नदी सागर से बिछड़ी,
पर्वत की चोटी से उतरी
गुफा, कन्दरा होती बहती !

जाने कितनी बाधाएं थीं
कितने अंध मोड़ आये थे,
कितना जल खो गया राह में
गहरी घाटी के साये थे !

मार्ग बनाती, तृषा बुझाती
नदी निरंतर बढ़ती जाती,
 सागर का कुछ पता नहीं था
अनजानी मंजिल थी भाती !

लेकिन उसको भान नहीं था
सागर हर पल उसे भरे था,
वर्षा में झर-झर अम्बर से
बूंद बूंद में वही झरे था !

वही दिशा देता था उसको
चाहे वह अनजान थी इससे,
हिम शिखरों से वही बहा था
नादां वह अनभिज्ञ थी इससे !

उसको स्वयं पर मान बड़ा था
नीर मधुर अति है यह मेरा,
मुझसे ही फसलें लहरातीं
यह जग सदा ऋणी है मेरा !

सागर निशदिन बना साक्षी
बूंद बूंद में भरता अमृत,
नदिया, झील, कूप, सरवर में
बसता छुप के सदा जागृत !

आखिर इक दिन ऐसा आया
जा पहुंची सागर के द्वारे,
महामिलन जिस घड़ी घटा था
मिला वहाँ शत भुजा पसारे !

तब जाकर सब भेद खुला था
सागर ने ही उसे रचा था,
सृष्टि कर्म चलाने हेतु
बस उसको सम्मान दिया था !  
  



  


17 टिप्‍पणियां:

  1. वाह ..............बहुत ही सुन्दर भाव

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    1. आभार, डॉक्टर संध्या तिवारी जी

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  2. लेकिन उसको भान नहीं था
    सागर हर पल उसे भरे था,
    वर्षा में झर-झर अम्बर से
    बूंद बूंद में वही झरे था !

    कितने सुंदर भाव हैं ....मन का मैल ही बह गया ...आपकी रचना पढ़कर ...
    आभर अनीता जी ..!

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  3. इंसान का जीवन भी ऐसा ही है....उसी परमात्मा से उत्पत्ति....बीच जीवन का उपापोह....और फिर उसी से समागम....!!
    बहुत सुन्दर...निशब्द..!

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    1. आपने बिल्कुल सही कहा..जहाँ से आये हैं वहीं लौट जाना है हमें

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  4. मिले सम्मान के बदले हम सदा उसी से शिकायत करते रहते हैं..क्योकि महा मिलन की बात जो भूल जाते हैं..

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    1. महामिलन की बात भूल ही नहीं जाते हम कई जन्मों से उसे सिरे से नकारते ही आये हैं...इस बार कुछ बात बनती नजर आ रही है

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  5. बूंद हो या नदी आखिर एक दिन सागर में मिल जाना है, वही सच्चा ठिकाना है... मन ने पाया विश्राम यहाँ... तरोताजा हो गया... आभार अनीता जी

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    1. संध्या जी, मन को वहीं विश्राम मिलता है जहाँ उसके सारे प्रश्न खो जाते हैं...आभार

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  6. वाह अति उत्तम अभिव्यक्ति।

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  7. बहुत सुन्दर गहरे भाव लिए
    बेहतरीन रचना:-)

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  8. बहुत सुंदर गीत खूबसूरत भाव लिये.

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  9. वाह: बहुत सुन्दर भाव लिए खुबसूरत रचना..

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  10. वन्दना जी, रीना जी, रचना जी, माहेश्वरी जी आप सभी का आभार !

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  11. लेकिन उसको भान नहीं था
    सागर हर पल उसे भरे था,
    वर्षा में झर-झर अम्बर से
    बूंद बूंद में वही झरे था !
    क्या कहें इन पंक्तियों पर अब. कई अर्थ हैं जो सामने आ रहे हैं.फिलहाल तो यहाँ बारिश हो रही है और इन पंक्तियों ने ह्रदय के का वो कोना फिर से छु लिया जिसे खुद से ही छिपा कर रखा था कई वर्षों से.आभार व्यक्त करूँ या दोष दूं आपको ह्रदय में पीड़ा भरने के लिए.

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