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मंगलवार, अगस्त 13

पीड़ा

पीड़ा 

ऐसी ही तो होती है पीड़ा

जैसे जम गया हो भीतर 

उदासी का एक पर्वत  

अवरोधित हो गयी हो

अविरल धारा 

जो बहा करती थी निर्द्वंद्व !

तरस रहा हो प्रेम का पंछी 

भरने को उड़ान 

क़ैद है शिशु ज्यों 

माँ के गर्भ में

समय से ज़्यादा 

पा रहा है पोषण 

पर तृप्त नहीं  

जन्मना चाहता है 

हवाओं में सांस लेना 

खुली धूप में चलना 

दौड़ना चाहता है 

पाना चाहता है तुष्टि 

प्रकृति के सान्निध्य में ! 


सोमवार, जनवरी 8

बूँद एक घर से निकली थी

बूँद एक घर से निकली थी 


अंधकार में ठोकर खाते 

आँखें बंद किए चलते हैं, 

जाने कौन  मोह में फँस कर 

अक्सर ख़ुद को ही छलते हैं !


छोटी-छोटी इच्छाओं के 

बोझे तले व्यर्थ दबते हैं, 

सिर पर गठ्ठर लादे, जाने

कब से बीहड़ पथ चलते हैं !


अनजाने ही रह जाते वह 

अपने दिल की गहराई से, 

जीवन की संध्या आ जाती 

कान भरे हैं शहनाई से !


सागर से मिल सकती थी जो 

मरुथल में दम तोड़ रही है, 

बूँद एक घर से निकली थी 

जाने क्या वह जोड़ रही है ! 


अपनी ही ऊँचाई से बच 

बौना होता जाता मानव, 

पहचाने जाते थे पहले 

अब सबके भीतर ही दानव ! 


दुख की ठोकर जब भी लगती 

जाग देखता है सोया मन, 

पीड़ा ही पथ पर रखती है 

सुख में तो भटका है जीवन !


पर्वत जैसा दुख भी आये 

सागर सुख का ठाँठे मारे, 

आँख मूँद कर चलते पथ में 

ज्योति निरंतर जलती द्वारे ! 


मंगलवार, मार्च 7

बादलों के पार


बादलों के पार
उठे धरा से छूने अम्बर
मेघपुंज के पार आ गए
छूटी पीछे दो की दुनिया
इक का ही आधार पा गए I

दूर कहीं है गंध धरा की
स्वर्णिम क्षण यह दृश्य अनोखा
ढका गया बादल से हर कण
दिखे कहीं न कोई झरोखा I

निर्मल नीले नभ की छाया
श्वेत मेघ तिरते झलकाते
मानो बिखरी शुभ्रा कपास 
या उड़तीं बगुलों की पातें I

हिमाच्छादित पर्वत माला
ज्यों मीलों दूर चली जाती
श्वेत बादलों की यह शैया
परीलोक की याद दिलाती I

शनिवार, अक्टूबर 1

आतुर है सूरज उगने को





आतुर है सूरज उगने को

श्वासें महकें  अंतर चहके 
पल पल नव गीत बजें भीतर,
जीवन जो भी भेंट दे रहा
स्वीकारें उत्साहित  होकर !

कभी-कभी ढक गया उजाला
कुछ भी नजर नहीं आता है, 
खुशियों के पीछे-पीछे ही
गम का दूत चला आता है !

लेकिन बादल कब तक आखिर
अंशुमान को ढक पाए हैं,
कब तक पर्वत रोक सकेंगे 
तूफान से टकराए हैं !

चलते जाना है रस्ते पर, 
कंटकमय या पथरीला है,
मंजिल दूर नहीं है साथी
अनथक थोड़ा सा चलना है !

खाली करके मन में भर लें, 
नए जोश औ' नए होश को,
उपवन बन जाये मन आंगन,
आतुर है सूरज उगने को !

हर उत्सव संदेशा लाया, 
थम कर थोड़ा भीतर झाँकें 
दुःख के पीछे छिपा हुआ जो, 
सुख के उस दरिया को पाके  I



गुरुवार, अगस्त 26

दूर और पास

 दूर और पास 

दूर से सूरज की आभा में 

 नीला पर्वत लग रहा था मोहक 

और उसके नीचे फैला हरा

मैदान बुला रहा था 

पर तपती दोपहरी में 

चला नहीं जाता पर्वत पर 

और मैदान के कंटक पैरों में चुभते थे 

थोड़ी सी दूरी तो चाहिए न 

आकर्षण बनाये रखने के लिए 

नील नभ पर बादल भले लगते हैं 

पर फट कर आंगन में गिर जाएँ तो दुःख देते हैं 

बच्चा नहीं जानता वह माँ के निकट है 

अलिप्त है सो सुंदर है उनके मध्य बहता प्रेम 

ज्यादा निकटता

कुरूपता को जन्म दे सकती है 

मान लेना ही काफी है 

 ‘वह’ सदा हमारे साथ है 

शायद उससे दूरी ही 

उसके प्रति प्रेम को बनाये रखती है ! 


शनिवार, अगस्त 29

क्या है मेरे ‘मैं’ की परिभाषा

 

क्या है मेरे ‘मैं’ की परिभाषा 


 

इस पर ही जीवन भवन बनेगा 

देह मात्र की दीवारों पर यदि टिका तो 

जर्जर हो अति शीघ्र गिरेगा 

अहंकार ‘मैं’ बन कर बोले 

यह जरा ठेस से इत-उत डोले 

मन बुद्धि को ही ‘मैं’ मानो 

कारागार बनेगा जानो 

‘मैं’ को नभ तक विस्तृत कर लें 

छत हो अम्बर, धरा फर्श हो 

पर्वत, वन दीवारें कर लें 

नदियों को भीतर बहने दें 

फूलों को भी मीत बनाएं 

सीमाएं तज जाति-पांति की 

मानव की गरिमा फिर पाएं 

नहीं झुकें आपद के आगे 

नहीं व्यर्थ के गाल बजाएं 

‘मैं’ को पावन शुद्ध करे जो 

‘उसमें’ ही सारा जग पाएं !

 

शनिवार, अप्रैल 25

एक है दूजे के लिए

एक है दूजे के लिए 

सूरज जलता है, तपता है 
ताकि जीवन की ज्योति जले धरा पर !
धरती गतिमय है रात-दिन 
बिना क्लांत हुए 
ताकि मौसमों का आना-जाना लगा रहे !
जब वह निकट हो जाती है सूर्य के 
ग्रीष्म की हवाएँ बहती हैं 
दूर हो जाती है तो पर्वतों पर 
बहने लगते है हिम के झंझावात 
मौसम बदलते हैं 
ताकि हरियाली और जीवन खिलता रहे !
हरे-भरे चारागाह भोजन देते हैं 
पशुओं को 
 वनस्पति और प्राणी एक-दूसरे के लिए हैं !
पर समय की धारा में 
जाने कब ऐसा हुआ कि
मानव जीने लगा
 मात्र अपने लिए ! 

रविवार, फ़रवरी 10

जाने कितने पर्वत नापे


जाने कितने पर्वत नापे


अनगिन बार खिलाये उपवन,
कंटक अनगिन बार चुभे हैं,
जाने कितने पर्वत नापे
कितनी लहरों संग तिरे हैं !

मंजिल अनजानी ही रहती
द्वार न उसका खुलता दिखता,
एक चक्र में डोले जीवन
सार कहीं ना जिसका मिलता !

बार-बार इस जग में आकर
दांवपेंच लड़ाए होंगे,
अंधकार में ठोकर खाकर
फिर-फिर नैन गँवाए होंगे !

भय भीत पर खड़ा है जीवन
कैसे मन को विश्राम मिले,  
सत्य से आँख मिले न जब तक
क्योंकर अंतर में राम मिले !


सोमवार, अक्टूबर 29

मन माटी से जैसे कोई


मन माटी से जैसे कोई


ऊँचे पर्वत, गहरी खाई
दोनों साथ-साथ रहते हैं,
कल-कल नदिया झर-झर झरने
दोनों संग-साथ बहते हैं !

नीरव जंगल, रौरव बादल
दोनों में ना अनबन कोई,
शिव का तांडव, लास्य पार्वती
दोनों में ही प्रीत समोई !

गीत प्रीत के, सहज जीत के
चलो आज मिल कर गाते हैं,
 नित्य रचे जाता नव संसृति 
उस अनाम को जो भाते हैं !

थिर अंतर में शब्द किसी का
लहरों का वर्तुल बन चहके,
मन माटी से जैसे कोई
अंकुर फूट लता बन महके !

भीतर-बाहर एक हुआ सब
सन्नाटा आधार सभी का,
मौन अबूझ शब्द हैं सीमित
दोनों में आकार उसी का !


शनिवार, सितंबर 29

इन्द्रधनुष सा ही जग सारा



इन्द्रधनुष सा ही जग सारा


एक दिवस, दिन की गुल्लक से
कुछ अद्भुत पल चुरा लिए थे,
ऋतु सुहावनी थी बसंत की
मदमाती सुरभित हवा लिए !

पर्वत के ऊँचे शिखरों पर
हिम के स्वर्णिम फूल खिले थे,
देवदार के तरुओं पर भी
आभामय कुछ छंद लिखे थे !

स्फााटिक मणि सी निर्मल शीतल
जल धारा इक बहती जाती,
फूलों की घाटी थी नीचे
तितली, भ्रमरों को लुभाती !

उन अनमोल क्षणों को दिल की
गहराई में छुपा रखा था,
आज टटोला सिवा ख्याल के
कहीं नहीं थी उनकी छाया !

काल चक्र भरमाता अविरत
चुकती जाती जीवन धारा,
अभी यहीं है, अभी नहीं है
इन्द्रधनुष सा ही जग सारा !


शुक्रवार, अगस्त 7

जीवन की गागर


जीवन की गागर

बड़ा हो कितना भी सूरज का गोला
विशाल हो कितना भी ब्रहमांड
अरबों-खरबों हों सितारे
गहरे हों सागर या ऊँचें हों पर्वत
जीवन उन सबसे बड़ा है
जीवन जो पलता है एक नन्हे पादप में
चींटी की लघु काया में
जीवन जो बन सकता है
मेधा कृष्ण में, प्रज्ञा गार्गी में
या प्रतिभा शंकर में
सोये हुए हम जान नहीं पाते
सपनों में खोये पहचान नहीं पाते
जीवन फिसलता जाता है हाथों से
चेतना जो निकट ही थी
दूर ही रहे जाती है
एक बार फिर जीवन की गगरी
बिन पिए खो जाती है !  

शनिवार, जुलाई 18

लद्दाख – धरा पर चाँद-धरा भाग - ५

लद्दाखधरा पर चाँद-धरा 
२ जुलाई
संध्याकाल में हिमाच्छादित पर्वत 
कल नुब्रा वैली से लौटकर हमने चाय के साथ सैंडविच का आनंद लिया, कुछ देर आराम करने के बाद टहलने गये. लैपटॉप पर वे सारी तस्वीरें देखीं जो पिछले दिनों उतारी थीं. सुबह पांच बजे ही सवेरा हो जाता है यहाँ, प्रातः भ्रमण से लौटते समय रनवे पर उतरते हुए एक हवाई जहाज की तस्वीर उतारी. आज नाश्ते में कुक ने आलू-टमाटर की सब्जी और पूरी बनाई साथ में रोज कि तरह दही. इस समय भाई अपने दफ्तर चला गया है जो दोपहर दो बजे लंच के लिए लौटेगा. पतिदेव कम्प्यूटर पर अपना कुछ काम करके आराम रहे हैं मेरी भी इस समय तक की डायरी एंट्री हो चुकी है. आज हमने वस्त्र आदि धोये हैं, कहीं दूर नहीं जाना है शाम को यहीं लेह के बाजार तक जायेंगे. बाहर तेज धूप है सोचती हूँ कुछ देर आराम कर लूँ.
पैंगोंग झील 

३ जुलाई
अभी कुछ देर पूर्व हमने खिड़की के बाहर ऊंचे पहाड़ों पर पड़ रही धूप के नजारे देखते हुए सुबह की चाय का आनंद लिया. ठंड बिलकुल गायब हो चुकी है, जो एक घंटा पूर्व सुबह की लगभग चार किमी की सैर के दौरान महसूस हो रही थी. जाते समय चढ़ाई है कुछ प्रयास करना पड़ता है पर वापसी में सहजता से दूरी तय हो जाती है. यहाँ काफी स्वच्छता है तथा सडकें भी काफी अच्छी हालत में हैं.  आज तो लौटते समय गोएयर के जहाज की लैंडिंग की वीडियो फिल्म बनाई. हम हवाई अड्डे के थोड़ा पीछे ही रह रहे हैं. लगभग सारी फ्लाइट्स सुबह के वक्त ही आती हैं, क्योंकि धूप तेज होते ही यहाँ तेज हवा चलने लगती है. आज हमें पेंगौंग झील देखने जाना है, जो एशिया की सबसे बड़ी साल्ट वाटर की शांत झील है जो इतनी ऊंचाई पर स्थित है. १४००० फीट की ऊंचाई पर स्थित इस झील का दो तिहाई भाग तिब्बत में है. रात को हम वहीं रहने वाले हैं, कल शाम तक वापस लौटेंगे. टीवी पर जो समाचार आ रहे हैं, एक नई उम्मीद जगा रहे हैं. डिजिटल इंडिया के बाद स्किल इंडिया का अभियान भी सरकार द्वारा चलाया गया है. लद्दाख की हमारी अब तक की यात्रा सुचारू रूप से चल रही है. यहाँ के रास्ते भी उतने ही सीधे-सरल हैं जैसे यहाँ के लोग, कहीं भटकने की गुंजाइश नहीं है. कल रात्रि भी कुछ स्वप्न देखे जो भीतर मन की गहराई में चल रही उथल-पुथल को बाहर निकलने में सक्षम रहे. परसों रात भी स्वप्न देखा था और एक पुरानी समस्या का समाधान पाया. कल यात्रा में हुए अनुभव को फिर से महसूस किया. नींद गहरी नहीं आती यहाँ, कल दिन में भी सो गयी थी जो हवाई अड्डे पर दिए गये निर्देशों के अनूरूप नहीं था.
चांगला 

४ जुलाई
कल सुबह नौ बजे हम झील के लिए रवाना हुए. कारू होते हुए चांगला पहुंचे जो १७६८८ फीट की ऊंचाई पर है. बर्फ से ढकी पहाड़ियाँ भव्य लग रही थीं. मार्ग में याक, जंगली घोड़े, खच्चर तथा फे नामके जंगली पीले बड़े आकार के चूहे दिखे. हमने हर जगह रुककर कुछ तस्वीरें लीं और आगे की यात्रा आरम्भ की. 

मार्ग में एक गाँव जिसका नाम सक्ति है साथ-साथ चल रहा था. हरे-भरे सरसों व जौ के खेत तथा सीधे पंक्ति बद्ध खड़े वृक्ष. पर्वतों के मध्य से जब पहली बार झील के दर्शन हुए तो हम मंत्रमुग्ध से देखते रह गये. पथरीले पर्वतों पर बनी सड़क पर बढ़ते हुए हम झील के निकट पहुंचे. आमिर खान की फिल्म ‘थ्री इडियट’ के नाम पर एक रेस्तरां भी वहाँ था. दोरजी हमें उस स्थान पर ले गया जहाँ फिल्म की शूटिंग की गयी थी. 
सक्ति गाँव 

झील का नीला और हरा जल मीलों तक फैला हुआ था, एक तरफ पर्वत थे और दूसरी ओर यात्रियों के लिए कैंप व तम्बू लगाये गये थे. कई श्वेत व सलेटी पंखों वाले पक्षी जिनकी चोंच व पंजे लाल थे, पानी में किलोल कर रहे थे. धूप तेज थी पर हवा भी तेज थी. हमें ऊंचाई पर होने वाली समस्या का अनुभव होने लगा था. हमने भी रात्रि निवास के लिए एक कैम्प में डेरा डाल लिया. कुछ देर वहाँ विश्राम के बाद हम साढ़े छह बजे पुनः झील पर गये. धूप अब दूर पर्वतों के शिखरों पर खिसक गयी थी, ठंड उसी अनुपात में बढ़ गयी थी. मफलर, स्कार्फ. दस्ताने आदि पहनकर हमने संध्या का आनंद लिया. एक व्यक्ति पानी में पैर डाले हुए चिल्ला रहा था, ठंड के कारण उसकी जान निकल रही थी पर फोटो खिंचाने के लिये शायद पानी में उतर गया था. रात्रि भोजन के बाद आकाश में दिख रहे पूर्ण चन्द्रमा को तथा झील के जल में नृत्य कर रही उसकी चन्द्रिका को देखकर कैम्प के बाहर से ही उसकी तस्वीरें उतारीं. ऊपर आकाश में चमकते हुए सैंकड़ों तारे इतने निकट प्रतीत हो रहे थे जैसे उन्हें छुआ जा सकता है.

झील पर जलचर 

सुबह साढ़े पांच बजे थे जब हम टेंट से निकले, सूरज काफी ऊँचा चढ़ आया था. पानी में उसकी सफेद रौशनी पड़ रही थी. कई तस्वीरें लीं. रात को एक बजे सिर दर्द की कारण नींद खुल गयी थी, समझ में आया इसीलिए ज्यादातर लोग रात्रि को झील पर रुकते नहीं हैं. नहाने के लिए गर्म पानी दिया जो यहाँ भी सोलर पॉवर से गर्म किया गया था. स्नानघर का फर्श कच्चा था, कोई फ्लोरिंग नहीं डाली गयी थी और ठंड भी बहुत थी सो हाथ-मुंह धोकर ही हम तैयार हो गये.  नाश्ते में पोहा तथा नमक व अजवायन के तिकोनाकर सादे परांठे (अमूल मक्खन व जैम के साथ) और चाय लेकर सवा आठ बजे हमने वापसी की यात्रा आरम्भ की. साढ़े बारह बजे हम पेगौंग झील से लौट आये.