जीवन में जब शुभ घटता है
व्यस्त हस्त चल रहे पाद दो
पल पल अंतर सुर बंटता है
निर्निमेष हैं मुग्ध नयन
पल-पल में अश्रु बहता है
एक गति भावों को मिलती
जीवन में जब शुभ घटता है
मुक्त हास हर पूर्ण आस तब
हरसिंगार हर रुत झरता है
अभिव्यक्ति होती है उसकी
पावनता से मन भरता है
पग में नृत्य गीत अधरों पर
सहज हुआ सा जो रहता है
माँ का हाथ सदा सर पर ज्यों
जैसे गंगा जल बहता है
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