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मंगलवार, सितंबर 23

एक वही तो डोल रहा है

एक वही तो डोल रहा है 


गा-गा कर थक गये सयाने

बुद्धि से तेज गति है जिसकी, 

जीवन एक सुगंध की खानि 

कानों में आ बोल रहा है !


स्थूल-सूक्ष्म दोनों के पीछे 

लघु-अनंत दोनों का कारण, 

चक्षुओं से अदृश्य हुआ जो 

एक वही तो डोल रहा है !


अपनी महिमा में ठहरा है 

महासागरों से गहरा है, 

अपनी महिमा ख़ुद ही जाने 

रस कण-कण में घोल रहा है !

 

वही हुआ मैं, वही हुए तुम 

धरती, अंबर, अगन, अनिल भी, 

जल जब चंचल गति से दौड़े 

राज स्वयं ही खोल रहा है !


गुरुवार, मार्च 27

जीवन में जब शुभ घटता है

जीवन में जब शुभ घटता है


व्यस्त हस्त चल रहे पाद दो
पल पल अंतर सुर बंटता है

निर्निमेष हैं मुग्ध नयन
पल-पल में अश्रु बहता है

एक गति भावों को मिलती
जीवन में जब शुभ घटता है

मुक्त हास हर पूर्ण आस तब
हरसिंगार हर रुत झरता है

अभिव्यक्ति होती है उसकी
पावनता से मन भरता है

पग में नृत्य गीत अधरों पर
सहज हुआ सा जो रहता है

माँ का हाथ सदा सर पर ज्यों
जैसे गंगा जल बहता है