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शनिवार, जुलाई 21

कैसे कोई बच सकता है


कैसे कोई बच सकता है


पलकों पे थमे झट से न गिरे
वे दो कतरे आँसू के झरे
मन भीग गया..
प्राची में जब फूल उगे
हिम शिखरों पर चांदी बिखरे
पिघले सोना सागर में जब
अवाक् हुआ मन भीग गया..

पर्वत पर छाया है किसकी
यह तुमुलनाद नभ में किसका
उन आँखों में यह कौन दिखा
मुस्कानों में झलकें किसकी
छोटा-छोटा खंड-खंड सा
वह तो मिलता ही रहता है
सोच यही मन भीग गया..

दर्पण में है सूरत किसकी
झील में ज्यों चाँद गगन का
छोटे छोटे अनुभव उसके
पर सारा का सारा वह है
बस देख यही मन भीग गया..

कैसे कोई बच सकता है
वही-वही तो चारों ओर
टुकड़ा-टुकड़ा खुद को देता
टुकड़ों में वह ही पाता है
वरना वह तो सदा बुलाए
जान यही मन भीग गया..