सुख शायद अनजाना सा था
सुख सागर से था मुँह मोड़ा
दुःख के इक प्याले की खातिर,
सुख शायद अनजाना सा था
दुःख ही था अपना परिचित चिर !
अपनी एक पोटली दुःख की
सभी लगाये हैं सीने से,
पीड़ा व संताप जहां है
जाने क्या है उस जीने में !
निज हाथों से घायल करते
तन-मन दोनों को ही निशदिन,
अपना अपना जिनको कहते
बैर निकाला करते प्रतिदिन !
कैसी माया है यह जग की
मन का भेद न जाने कोई,
जिसका दूजा नाम ही पीड़ा
बिन त्यागे न राहत कोई !
या तो शरणागत हो जाएं
या फिर खुद को ही पहचानें,
मन के चक्कर में जो आया
हाल जो होगा वह ही जाने !
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