बैसाखी लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
बैसाखी लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

सोमवार, अप्रैल 13

बैसाखी की आत्मा

बैसाखी की आत्मा 


फसल पक गई जब खेतों में 

बगिया में रस घट भर आये, 

मधुर पताशों की लज्जत  का 

सुमिरन अंतर में हो आये !


खालिस शिष्य बनाये इस दिन 

पंथ खालसा तभी कहाया, 

अपने धर्म की रक्षा हेतु 

हाथों में कृपाण उठवाया !


  मिटा दिये थे भेदभाव सब

अनंतपुर ने दी थी साखी, 

  तलवार बनी, ढाल भीरु की

  बन  प्रेरक आयी गुरु वाणी !

 

 लेकर पाँच विकार के पार

अन्याय का विरोध सिखाता, 

बैसाखी का गीत-संगीत

गुरु गोविंद की सुध दिलाता ! 

 

शुक्रवार, अप्रैल 14

आये पर्व अनोखे


आये पर्व अनोखे

जब बजे ढोल, नाचते  कृषक

झूमी फसलें, ह्रदय में पुलक ! 


‘नब बर्ष’  बंगाल में आये

‘पुत्तांडु’ सभी तमिल मनायें !


केरल में पावन  ‘पूरम विशु’

असम में ‘रोंगाली  बीहू’!


गुरूद्वारों में द्युति छायी

तब प्यारी बैसाखी आयी !


धूम मचाती भाती हर मन

जन्म खालसा हुआ इसी दिन !


अमृत छकया पंच प्यारों ने

गुरुसाहब की याद दिलाने !


भँगड़ा  गिद्दा होड़ लगाते

घर बाहर रोशन हो जाते !


सब के मन पर मस्ती छायी  

तब प्यारी बैसाखी आयी !


सोमवार, अप्रैल 13

आशा ज्योति जलानी है

आशा ज्योति जलानी है


खेतों में झूम रही फसलें 
कोई भंगड़ा, गिद्दा, न डाले,  
चुप बैठे ढोल, मंजीरे भी
इस बरस बैसाखी सूनी है !

यह किसकी नजर लगी जग को 
नदियों, सरवर के तट तकते, 
नहीं आचमन न कोई डुबकी 
यह कैसी छायी उदासी है !

बीहू का उत्सव भी फीका 
कदमों को किस ने रोका है,
आया 'पहला बैसाख'  लेकिन  
कोई जुलूस ना मेला है !

केरल में विशु गुमसुम मनता
यह कैसा सन्नाटा छाया, 
संशय के बादल हों कितने  
पर आशा ज्योति जलानी है !