शुक्रवार, नवंबर 19

प्रेम

प्रेम

प्रेम ! एक पहाड़ी नदी
जो उदगम पर उफनती, शोर मचाती
उच्च प्रपात बन छलांग लगाती
खो जाती कभी गहन कन्दराओं में !

वैसे ही सिमट जाता
प्रेम ! मन की गुफाओं में
कभी विशाल धारा सम शांत
बहता, फिर हो जाता संकरा
पर सदा बना रहता
सदानीरा सा !

अमरबेल सा बसा रहता
दिल की गहराइयों में
कभी गुप्त, प्रकट कभी
प्रेम स्वयं में अपूर्ण है,
परम से मिलने तक !
जैसे नदी सागर मिलन से पूर्व !

अनिता निहालानी
१९ नवम्बर २०१०
 

2 टिप्‍पणियां:

  1. अनीता जी,

    प्रेम को सुन्दर परिभाषा में बंधा है आपने....मन के तल का प्रेम जो कभी पर्वत से ऊँचा तो कभी सागर से गहरा....बहुत सुन्दर |

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  2. अनित अजी,

    कलम का सिपाही पर आपकी टिप्पणी का शुक्रिया...मैं आपसे काफी हद तक सहमत हूँ माफ़ी माँगना एक महान काम है ...पर माफ़ कर देना सबसे महान है|

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