मंगलवार, नवंबर 23

जिसने जाना राज अनोखा

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जिसने जाना राज अनोखा

मुंदे नैन में झलक उसी की
खोया मन आहट पा उसकी,
गूंज रही रह रह कोई धुन
अधरों पर स्मित, बात उसी की !

कितना अद्भुत खेल रचा है
खुद को ढूंढे खुदी छुपा है,
जिसने जाना राज अनोखा
जीवन उसने ही जीया है !

सभी करे पर कुछ न करता
एक साथ सारे दुःख हरता,
स्वयं बांधे थे बंधन सारे
हँस हँस के हर बोझ उतरता !

साँस साँस में याद उसी की
फिर भी पहुँच न उस तक होती,
कदम कदम है उसकी पूजा
कह कह पूरी बात न होती  !

जाने हैं सब किसको ध्यायें
किसकी राह में नयन बिछाएं,
लेकिन जब तक मुड़ें न भीतर
खुद को हम क्योंकर ही पाएँ !

अनिता निहालानी
२३ नवम्बर२०१०  




6 टिप्‍पणियां:

  1. ....लेकिन जब तक मुड़ें न भीतर
    खुद को हम क्योंकर ही पाएँ !

    अद्‍भुत,सच्ची अभिव्यक्ति!वाह!

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  2. कितना अद्भुत खेल रचा है
    खुद को ढूंढे खुदी छुपा है,
    जिसने जाना राज अनोखा
    जीवन उसका धन्य हुआ है !
    adbhut hi hai ....

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  3. खुद को खुद से मिलाती रचना ....बहुत सुन्दर

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  4. अनीता जी,

    बहुत सुन्दर कविता....इस बार आपने तस्वीर का भी बहुत सुन्दर प्रयोग किया है...सच कहूँ तो तस्वीर पोस्ट में चार चाँद लगा देती है.....ये पंक्तियाँ बहुत अच्छी लगीं......शुभकामनायें|

    "कितना अद्भुत खेल रचा है
    खुद को ढूंढे खुदी छुपा है,
    जिसने जाना राज अनोखा
    जीवन उसने ही जिया है !"

    मुझे लगता है यहाँ 'जिया' की जगह 'जीया' होना चाहिए था|

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  5. इमरान जी, आपने बिल्कुल सही कहा है, 'जीया' ही होना चाहिए, धन्यवाद ! यह तस्वीर दुलियाजान के निकट बह रही एक नदी की है.

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  6. किसकी बात करें-आपकी प्रस्‍तुति की या आपकी रचनाओं की। सब ही तो आनन्‍ददायक हैं।

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