शनिवार, नवंबर 6

उत्सव के बाद

उत्सव के बाद

रह रह कर मस्ती की गागर
जाने किसने भीतर फोड़ी,
अनजानी सी कुछ अनछूई
खुशियों की चादर है ओढ़ी I

नेह पगा मन टपकाए जो
रस की मधुरिम धार नशीली,
बिन कारण अधरों पर अंकित
कोमल सी मुस्कान रसीली I

न स्मृतियाँ न स्वप्न ही कोई
भीतर एक खाली आकाश,
उसी शून्य से झर झर झरता
मदमाता स्नेहिल प्रकाश I

कदमों में थिरकन भर जाता
हाथों में ऊर्जा वह अभिनव,
नयनों में जल प्रीत है भरा
मन अंतर में आह्लाद प्रणव I

गुनगुन करता कोई विहरे
चेतनता का गूंजता गान,
तार जुड़ें जब हों अदृश्य से
बिन साधे लगता है ध्यान I

उत्सव के उल्लास में डूबा
जाने कौन पाहुना आया,
मन जब अपने घर को लौटा
चैन जहाँ भर का फिर पाया I

अनिता निहालानी
६ नवम्बर २०१०    
  

8 टिप्‍पणियां:

  1. उत्सव के उल्लास में डूबा जाने कौन पाहुना आया, मन जब अपने घर को लौटा चैन जहाँ भर का फिर पाया I
    बहुत सुंदर भावों को सरल भाषा में कहा गया है. अच्छी रचना

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  2. आदरणीय अनिता जी
    नमस्कार !

    कमाल की लेखनी है आपकी लेखनी को नमन बधाई

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  3. गुनगुन करता कोई विहरे
    चेतनता का गूंजता गान,
    तार जुड़ें जब हों अदृश्य से
    बिन साधे लगता है ध्यान I

    बहुत सुन्दर भावाभिव्यक्ति

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  4. बहुत सुंदर अनीता जी...... दिल को छू गईं .

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  5. अच्छी रचना, भाव से परिपूर्ण, उत्सव के उल्लास में डूबा ........बधाई

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  6. आप सभी का आभार और अभिनदंन उत्सव के उल्लास में डूबने के लिये!

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