मंगलवार, अगस्त 9

कैसी है यह विडंबना


कैसी है यह विडंबना

भीतर इक प्रकाश जगा है
बाहर लेकिन अंधकार है,
जिसका ज्ञान हुआ है भीतर
बाहर दिखता नहीं प्यार है !

एक तत्व से बना जगत यह
फिर भी भेदभाव कर्मों में,
एक ही ज्योति हुई प्रकाशित
फिर भी पृथक हुए धर्मों से !

कथनी करनी का यह अंतर
साल रहा मन को भारी है,
सहज मिटेगा यह अंतर भी
खोज अभी मन की जारी है !

प्रेम किये से पड़े झेलना
स्वयं को भी जीवन का जुआ,
प्रेम मांगता कीमत अपनी
सरल शाब्दिक देना दुआ !

भीतर एक अकर्ता बैठा
लेकिन कर्म से मुक्ति नहीं है,
क्या करना क्या नहीं है करना
इसकी कोई युक्ति नहीं है ?

पर उपदेश कुशल बहुतेरे
सत्य यही सामने आता,
निज सुख की खातिर दूजे को
जब कोई गुलाम बनाता !

उसमें कोई गति नहीं है
अचल अनादि जो अनंत है,
मन में ही घटना-बढ़ना है
लेकिन स्वयं सदा बेअंत है !  
    

12 टिप्‍पणियां:

  1. पर उपदेश कुशल बहुतेरे
    सत्य यही सामने आता,
    निज सुख की खातिर दूजे को
    जब कोई गुलाम बनाता

    बहुत सही कहा है आपने। इसांन की फितरत ही ऐसी होती है।

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  2. भीतर एक अकर्ता बैठा
    लेकिन कर्म से मुक्ति नहीं है,
    क्या करना क्या नहीं है करना
    इसकी कोई युक्ति नहीं है ?

    यही दुविधा तो जीवन पर्यन्त चलती है......आपकी पोस्ट पढ़कर वाकई मन को एक सुकून सा मिलता है........शुभकामनायें आपको|

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  3. कथनी करनी का यह अंतर
    साल रहा मन को भारी है,
    सहज मिटेगा यह अंतर भी
    खोज अभी मन की जारी है !

    बहुत ही गहन और सार्थक रचना ..
    आपकी रचनाएँ पढ़कर एक सही सोच की दिशा मिलती है मन को .
    बधाई एवं शुभकामनायें...!!

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  4. खूबसूरत सन्देश और भाव है इस रचना में ....
    शुभकामनायें आपको !

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  5. यही विडम्बना ही तो हमारा इस संसार से मोह भंग कराती है.

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  6. भीतर एक अकर्ता बैठा
    लेकिन कर्म से मुक्ति नहीं है,
    संदेश बहुत स्पष्ट है। कविता का प्रवाह प्रभावित करता है।

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  7. भीतर इक प्रकाश जगा है
    बाहर लेकिन अंधकार है,
    जिसका ज्ञान हुआ है भीतर
    बाहर दिखता नहीं प्यार है !

    Sundar Rachna .

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  8. भीतर एक अकर्ता बैठा
    लेकिन कर्म से मुक्ति नहीं है,
    क्या करना क्या नहीं है करना
    इसकी कोई युक्ति नहीं है ?


    बहुत ही बढ़िया।

    सादर

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  9. कल 15/08/2011 को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

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  10. भीतर इक प्रकाश जगा है
    बाहर लेकिन अंधकार है,
    जिसका ज्ञान हुआ है भीतर
    बाहर दिखता नहीं प्यार है !
    बहुत अच्छे भाव लिए शानदार अभिब्यक्ति /बधाई आपको /
    ब्लोगर्स मीट वीकली (४)के मंच पर आपका स्वागत है आइये और अपने विचारों से हमें अवगत कराइये/आभार/ इसका लिंक हैhttp://hbfint.blogspot.com/2011/08/4-happy-independence-day-india.htmlधन्यवाद

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