बुधवार, अगस्त 24

बच्चों के स्कूल की पत्रिका के लिए एक संस्मरणात्मक लेख


बचपन के दिन भी क्या दिन थे

अभी कुछ दिन पूर्व टाइनी टॉटस् स्कूल की प्रधानाध्यापिका ने फोन पर कहा कि मैं उनकी स्कूल- पत्रिका के लिए कोई लेख या संस्मरण लिखूं. मानस पटल के पृष्ठ पलटे तो मुझे उन्नीस-बीस बरस पहले की कई बातें याद आने लगीं, जब मेरा पुत्र सिद्धार्थ (गुड्डू) पहले नर्सरी फिर किंडर गार्टन में पढने गया था. वह तीन वर्ष का था जब हमने पहले-पहल उसका नाम लिखवाया पर कुछ ही दिन वह स्कूल गया होगा, कुछ पारिवारिक कारणों से व बी.एड. करने के विचार से एक वर्ष के लिए मैं उसे लेकर वाराणसी चली गयी. पुनः चार वर्ष की आयु में उसका दाखिला हुआ. उसे ऐसा ही लगा जैसे पहली बार वह स्कूल गया है, उस दिन वह थोडा उदास था. मुझे याद है उसे पहले दिन स्कूल छोडकर मैं भी घर नहीं जा पाई थी सामने जालोनी क्लब में चली गयी कुछ देर बाद पुनः उसकी कक्षा के बाहर से ही झांक कर देखा वह टीचर के पास ही खड़ा था, और हँस कर कुछ बात कर रहा था. मैं फिर आश्वस्त होकर घर लौट गयी. पर मन में बहुत सी बातें घूम रहीं थीं, अब उसे अपने आप खाना भी सीखना होगा, सुबह जल्दी उठना नहीं चाहता है, सुबह उसे कुछ खाना भी पसंद नहीं है, कैसे वह अकेले रहेगा. लेकिन वह स्कूल से लौटा तो बहुत उत्साहित था, अगले कुछ ही दिनों में कई राईमस् भी याद करके सुनाने लगा था.

उसकी अध्यापिका से बात करके हमने उसे के.जी. के लिए टेस्ट दिलवाया और वह नई कक्षा में जाने लगा. रोज सुबह स्कूल जाने से पहले बोलता, बस आज मैं नहीं जाऊंगा सिर्फ आज, जबकि उसे पता होता कि वह जायेगा जरूर. कभी कभी आंसू भी निकल आते पर मैं रिक्शे पर बैठा कर उसे विदा कर देती, यह सोचते हुए कि थोड़ी देर में अपने आप चुप हो जायेगा. पर कभी-कभी स्कूल जाने के लिए उसका उत्साह देखते ही बनता था, घर आकर गृह कार्य करता और ढेर सारी बातें बताता, पता नहीं बच्चों में इतनी ऊर्जा कहाँ छुपी रहती है. शायद उन्हें परमात्मा का रूप इसीलिए कहते हैं क्योंकि  उनका सम्बन्ध ऊर्जा के स्रोत परमात्मा से जुड़ा ही रहता है. छुट्टी के दिन वह दिन में सोना नहीं चाहता, शाम होते ही झूला पार्क जाने की तैयारी शुरू हो जाती, अब तो वह अकेला भी जाने लगा.

एक दिन स्कूल से आकर उसने कहा कि उसका टिफिन किसी बच्चे ने फिर से खा लिया, हमने पूछा तो क्या पहले भी खाया था. तो उसने कहा, “अरे, क्या आपको पता नहीं है बच्चे एक दूसरे का टिफिन खाते ही रहते हैं ! मैं उसका मुख ही देखती रह गयी. शुरू शुरू में वह शर्माता बहुत था, किसी को कविता सुनाने में घबराता भी था. एक दिन घर आकर कहने लगा आज मैं रोया था, आपकी याद आ रही थी.

उसकी पहली परीक्षा आयी तो हम उसे ज्यादा पढाना चाहते थे, वह खेलना चाहता था, पढ़ने के लिए उसे बैठाना कितना मेहनत और सूझबूझ भरा काम था इसे कोई माँ ही जान सकती है. बच्चा और खेल एक-दूसरे के पर्याय हैं. जब तक वह जगता है खेलना ही चाहता है, आज सुनती हूँ कि जीवन को खेल की तरह लेना चहिये तो बच्चों पर प्यार आता है पर मुझे याद है उस वक्त तो उसे  जबरदस्ती खेल से उठाना ही पड़ता था.

एक बार वह स्वप्न में बहुत हंस रहा था जब जगा तो मैंने कारण पूछा. उसने अपना स्वप्न सुनाया और यह भी कहा कि इसे डायरी में लिख लीजिए ताकि बाद में पापा भी पढ़ सकें, “ मैं और एक बच्चा जा रहे थे, कि एक आइसक्रीमवाला तथा एक किताबवाला मिला. आइसक्रीमवाले के पास मैं गया और उसे एक लकड़ी दी कहा कि इस पर आइस क्रीम लगा दो, उसने मना कर दिया. लकड़ी पर नहीं लगाई पर मेरे चेहरे पर उसने आइस क्रीम लगा दी, और मैं खूब हँसने लगा.

घर के खाली कमरे को उसने अपना दफ्तर बना लिया था. रोज स्कूल से आकर खाना खाकर पहले वहाँ जाता और पता नहीं किसे-किसे टेलीफोन करता व टाइपराइटर पर कुछ काम करता, जाने क्या-क्या कहता और कौन उसकी बातों का जवाब भी देता. मुझे याद है एक बार वह स्कूल से लौटा तो किसी और के कपड़े पहने हुए था जाहिर है हमें थोड़ी उत्सुकता हुई, पता चला वह स्कूल में गिर गया था कपड़े गंदे हो गए सो टीचर ने दूसरे कपड़े पहना दिए. तब भी हमें और कई अवसरों की तरह स्कूल पर गर्व हुआ था.

स्कूल में यदि टेस्ट हो तो तबियत ठीक न होने पर भी वह जाने की जिद करता था. एक बार उसकी बांयी आंख हल्की लाल थी, वर्षा भी हो रही थी मैंने कहा आज वैसे भी बच्चे कम आएंगे तुम मत जाओ, पर स्कूल छोडना उसे गवारा नहीं. एक दिन स्कूल जाने से पहले वमन हो गया तो मैंने कहा आज रहने दो कहीं स्कूल में कुछ ऐसा हुआ तो क्या करोगे, जवाब में उसने कहा टीचर से “एक्सक्यूज मी” कहकर सिंक पर चला जाऊंगा और कुल्ला करना भी मुझे आता है.

एक बार की बात हमें कभी नहीं भूलती शाम को, बल्कि रात ही हो गयी थी वह बाथरूम में था कि रोने लगा, बहुत पूछने पर बताया, परीक्षा में उसने एक स्पेलिंग गलत लिख दी थी, अब उसे सही स्पेलिंग याद आयी है, हम उसे मुश्किल से समझा पाए. बच्चों का मन कितना कोमल होता है उनके मन पर धीरे- धीरे दुनिया के रंग-ढंग चढते जाते हैं, बड़ों के तनाव का असर भी उनके मन पर पड़े बिना नहीं रह सकता. माता-पिता के शिक्षक भी बन जाते हैं कई बार बच्चे, जब वे अपनी  झूठी अहम् की लड़ाई में यह भूल ही जाते हैं कि बच्चा चाहे कुछ न कहे सब समझ रहा है.

एक बार पाँच स्पेलिंग याद करके ले जाने को उसकी टीचर ने कहा था और अगले दिन डिक्टेशन लेने को कहा था, उसको शायद याद करने में इतनी मुश्किल नहीं होती पर वह थोडा डर गया, बोला एक दिन में बच्चे कैसे याद कर सकते हैं, बच्चे बहुत संवेदनशील भी होते हैं. मजाक में उसके पिता ने कह दिया कि जीरो मिलेंगे बस आँखों में आंसू भर लाया. बच्चे पिता को अपना आदर्श मानते हैं, एक दिन कहने लगा कि उसे अंग्रेजी फिल्मों में या तो कॉमेडी पसंद है या जेम्सबॉंड की फ़िल्में. एक बार पिता के मुख से सुन लिया कि उन्हें हर सब्जी में आलू नहीं अच्छे लगते, कुछ दिनों के बाद स्कूल से लौटा तो गम्भीर होकर बोला, “आप रोज-रोज आलू ही क्यों देती हैं, मुझे जरा भी पसंद नहीं” जबकि आलू उसे बहुत पसंद थे.
कहानियाँ सुनना उसे बहुत भाता, सुपर मैन, ही मैन, स्पाइडर मैन उसके मनपसंद नायक थे. रामायण की कहानी याद ही हो गयी थी मैं शुरू करती तो आगे खुद ही सुनाने लगता. कभी-कभी टीवी पर कहानी सुन कर हमें भी खूब चटखारे ले लेकर सुनाता. कभी हम अपनी किसी रोचक पुस्तक में मगन होते तो वह चम्पक पढ़ने की जिद करता हम डांट कर उसे सुला देते. हमें थोड़ी देर अफ़सोस भी होता पर जानते थे कि सोकर उठेगा तो सब कुछ भूल चुका होगा. तभी तो बच्चे इतने प्यारे लगते हैं वे हम बड़ों की तरह बात को पकड़ते नहीं.

बच्चे को दिनोंदिन व धीरे-धीरे समझदार होते और बड़ा होते हुए देखना माता-पिता दोनों के लिए एक अनोखा अनुभव होता है. एक पल वह नन्हा बच्चा बन जाता है पर अगले ही पल कोई ऐसी बात कहेगा कि लगता है, अब बड़ा हो गया है. एक रात कहने लगा, माँ, जब मैं अकेला होता हूँ तो अकेला नहीं होता, कोई मेरे साथ रहता है जो मेरी बाते सुनता है बस जवाब नहीं दे पाता. मैंने पूछा कौन है वह, तो बोला,  “मेरा मन” उसके साथ मैं खूब बातें करता हूँ.

हल्की सर्दी में एक बार उसे पूरी बांह की कमीज पहना दी तो बोला कुछ अच्छा नहीं लग रहा है, शायद उसे गर्मी लग रही थी, लेकिन थोड़ी ही देर में वह खुश हो गया. बच्चे हर वक्त कैसे खिले खिले रह लेते हैं .... तभी तो वे बच्चे हैं....एक बार सर्दियों की शुरुआत थी, आकाश पर बादल थे, स्वेटर पहनाने के लिए कहने लगा, तर्क दिया, क्या पता मौसम बिगड जाये.

मैंने जब उसके लिए फलालेन की नाईट ड्रेस सिल कर दी, पूरा दिन लग गया था. उसका चेहरा खिल गया, कहने लगा, आप मुझे हमेशा खुद सिल कर कपड़े दीजियेगा. मुझे व्यायाम करते देख उसने भी सीख लिया था, और लिखता देख खुद भी डायरी लेकर बैठ जाता. स्कूल के सिल्वर जुबली उत्सव में भी उसे भाग लेने का मौका मिला था, खरगोश की ड्रेस में उसकी तस्वीर आज भी हमारे पास है.

बातें तो कितनी हैं, हर माँ के मन में अपने बच्चे की बातों का एक खजाना होता है. उसके जीवन में स्कूल की कितनी बड़ी भूमिका होती है इसे माँ ही जानती है, जब हर रोज वह उसकी कापियां देखती है, उसे नया पाठ सीखते हुए देखती है, उसका मन टीचर के लिए और स्कूल के लिए कृतज्ञता से भर जाता है. जो बच्चे स्कूल नहीं जा पाते उनका जीवन एक बहुत बड़ी संपदा से वंचित रह जाता है, ज्ञान की संपदा जिसके जैसा इस जगत में कुछ भी नहीं. मेरी हार्दिक कामना है कि टाइनी टॉटस् स्कूल सदा इसी तरह नन्हे-मुन्नों के जीवन में रोशनी बिखेरता रहे.



  

   
  

11 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर संस्मरण साझा किया है .बचपन होता ही ऐसा है .एक माँ के ह्रदय के भावों को भी बहुत सुन्दरता के साथ उकेरा है .आभार .

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  2. बहुत सुन्दर संस्मरण..बचपन में सभी बच्चे एक जैसे ही होते हैं..

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  3. वाह बहुत ही सुन्दर संस्मरण है हम तो उसी मे डूबे रह गये……………

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  4. बहुत ही भावनात्मक संस्मरण. मुझे भी अपने बच्चों के शुरू के साल याद आ गए.

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  5. कितना रोचक लिखा है.पढ़ती गई और पढ़ती ही गई.ऐसे ही संस्मरण और भी पढ़ने की इन्तजार है अब.

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  8. अपने बच्चे की एक एक बात मां के दिल में समायी रहती है आपने अपनी भावनाओं को सुंदर शब्दों में ढ़ाला है ।

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