शुक्रवार, मार्च 16

है बेबूझ बात यह दिल की


है बेबूझ बात यह दिल की

मदिर चाँदनी बिखरी जैसे
गुनगुन कोई गीत सुनाता,
तेरी यादों में मन खोया
काल का पंछी भी थम जाता !

लहरें उठतीं गिरतीं जैसे
बहे ऊर्जा का इक दरिया,
भाव मधुर वंशी बन गूंजे
मन चादर में पड़े लहरिया !

थिर कदमों में नृत्य समाये
मूक हुआ कोई हँसता जाये,
तृषित अधर मन इक प्याला हो
एक हाथ कोई ताल बजाए !

है बेबूझ बात यह दिल की
एक अनोखी सी महफिल की,
आँखों आँखों में ही घटती
तय होती दूरी मंजिल की !

11 टिप्‍पणियां:

  1. अनोखे अनुभव को भी कितनी सरलता से आप शब्द दे देती हैं..मैं चकित हो जाती हूँ..

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    1. अमृता जी, जो चकित करता है वह परमात्मा है और जो चकित होता है वह भी..वही लिखवाता है और वही पढवाता है

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  2. है बेबूझ बात यह दिल की
    एक अनोखी सी महफिल की,
    आँखों आँखों में ही घटती
    तय होती दूरी मंजिल की !bahot sunder likhi hain.....

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  3. थिर कदमों में नृत्य समाये
    मूक हुआ कोई हँसता जाये,
    तृषित अधर मन इक प्याला हो
    एक हाथ कोई ताल बजाए !

    अति उत्तम भाव संयोजन्।

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  4. है बेबूझ बात यह दिल की............

    लहरें उठतीं गिरतीं जैसे
    बहे ऊर्जा का इक दरिया,
    भाव मधुर वंशी बन गूंजे
    मन चादर में पड़े लहरिया !

    अनबूझे से भाव....!!

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  5. लहरें उठतीं गिरतीं जैसे
    बहे ऊर्जा का इक दरिया,
    भाव मधुर वंशी बन गूंजे
    मन चादर में पड़े लहरिया !

    ....बहुत सुंदर अहसास...आभार

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  6. आप सभी का बहुत बहुत आभार !

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