बुधवार, मार्च 14

जादू प्रेम का


जादू प्रेम का

उसका जाना एक नेमत बन गया
 याद का बादल बरसा
हुलसा तन, मन भीग गया !

बेरुखी उसकी बनी इनायत ऐसे
खुद को परखा
दिखे ऐब भीतर कैसे - कैसे !

उससे दूरी मिलन का सबब बनी
धुलीं आँखें अश्रुओं से
भीतर रोशनी छनी !

 उसकी बातें चुभीं जब तीर सी
झाँका नयन में उसके
तस्वीर अपनी दिखी !

10 टिप्‍पणियां:

  1. उसकी बातें चुभीं जब तीर सी
    झाँका नयन में उसके
    तस्वीर अपनी दिखी !

    ..........kamaal hai ji, wah !!!!!!!!!!!!

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  2. यही तो हैं प्रेम के करिश्मे....

    सुन्दर भाव अनीता जी
    सादर.

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  3. प्रेम जादू ही तो है,और वो सिर चढ़ कर बोलता है.

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  4. आपकी कविता कोई जादुगरी नहीं वास्‍तविक जीवन की सक्षम पुनर्रचना है सर्जनात्‍मक ऊर्जा की सक्रियता है ।

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  5. सुभानाल्लाह बहुत खूब कई बार चोट खाकर ही आदमी संभालता है ।

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  6. उसकी बातें चुभीं जब तीर सी
    झाँका नयन में उसके
    तस्वीर अपनी दिखी !
    प्रेम का अज़ब गज़ब रूप है यह भी , जादुई ही !

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  7. आप सभी सुधी पाठकों का तहे दिल से आभार !

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