मंगलवार, सितंबर 23

हँसना यहाँ गुनाह है


हँसना यहाँ गुनाह है



लगा दो पहरे खुशियों पर
क्यों मनुआ बेपरवाह है
हँसना यहाँ गुनाह है !

खुश रहना क्योंकर सीखा है
यह तो गमों की बस्ती है,
आँसूं ही भाते हैं जग को
नहीं हँसी की हस्ती है !

पर काट दो उम्मीदों के
क्यों उड़ने की चाह है
हँसना यहाँ गुनाह है !

पलकों पर क्यों पुष्प सजाये
अविरत पीड़ा बहने दो,  
मुखर हुए क्यों नयन बोलते
चुप ही इनको रहने दो !

पुनः बांध लो जंजीरों को
लम्बी अति यह राह है
 हँसना यहाँ गुनाह है !






10 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी लिखी रचना बुधवार बुधवार 24 सितम्बर 2014 को लिंक की जाएगी...............
    http://nayi-purani-halchal.blogspot.in आप भी आइएगा ....धन्यवाद!

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  2. यही नियति बना दी गई है- पता नहीं क्यों!

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  3. बहुत सटीक और मर्मस्पर्शी प्रस्तुति...

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