मंगलवार, जुलाई 14

लद्दाख – धरा पर चाँद धरा भाग-१

लद्दाखधरा पर चाँद धरा

२८ जून २०१५  

आज सुबह सात बजे हम दोनों लेह पहुंच गये थे. कल दोपहर सवा बारह बजे घर से निकले थे, धूप तेज थी पर डिब्रूगढ़ हवाई अड्डे के रास्ते में दो बार वर्षा हुई और ठंडी हवा चलने लगी. दिल्ली तक की हवाई यात्रा अच्छी रही, इन्डिगो का आतिथ्य स्वीकार करते हुए उपमा और मसाला चाय ली. दिल्ली में मंझले भाई के घर पहुंचने से पूर्व भाभी को फोन किया, वह घर से बाहर थी, पर हमारे पहुंचने से पूर्व ही लौट आई. भाई एक दिन पूर्व लेह पहुंच गया था, जहाँ वह एम.ई.एस में जॉब करता है. भाभी द्वारा परोसा स्वादिष्ट भोजन खाकर हम जल्दी ही सो गये पर देश की राजधानी में भी बिजली चले जाने से एसी बंद हो गया और नींद खुल गयी, सुबह अभी आकाश में तारे थे जब हम देहली एयरपोर्ट पर पहुंच गये. वहाँ एक लद्दाखी महिला बहुत अपनेपन से मिली जो अपने ग्याहरवीं में पढ़ रहे पुत्र को छोड़ने दिल्ली आई थी और अब वापस जा रही थी, लेह में उच्च शिक्षा का अभी उतना अच्छा प्रबंध नहीं है, हाई स्कूल के बाद बच्चे श्रीनगर, जम्मू, दिल्ली या चंडीगढ़ पढ़ने के लिए जाते हैं. पांच बजे जहाज में बैठे पर अंततः छह बजे जेट कनेक्ट का जहाज उड़ा और एक घंटे की यादगार यात्रा के बाद लेह के ‘कुशोक बकुला रिनपोछे एयरपोर्ट’ पर पहुंचा. हमने खास तौर पर खिड़की के पास वाली सीट लेनी चाही थी पर पता चला पन्द्रहवीं कतार में खिड़की ही नहीं है, सीट बदल कर चौदहवीं कतार में आये पर खिड़की के पास जगह खाली नहीं थी, दूर से ही हिमाच्छादित पर्वत श्रृखंलाओं को देखते और तस्वीरें उतारते एक घंटे के समय का पता ही नहीं चला. जहाज से उतरते ही पता चला कि वायुदाब व ऑक्सीजन के कम होने का असर कैसे प्रभाव डाल सकता है. जगह-जगह सूचनाएं दी जा रही थीं कि चौबीस घंटों तक ज्यादा श्रम न करें, अपने कमरे में ही रहें और शरीर को यहाँ के वातावरण के अनुकूल होने दें. हमने बचाव के लिए पहले ही डायमॉक्स नामक दवा की एक गोली ले ली थी और एक नाश्ते के बाद लेने वाले थे.
आज पहला दिन विश्राम का दिन है. यहाँ आंचल नामका एक डोगरी रसोइया जो ऊधमपुर का रहने वाला है, खाना बनाता है. सुबह आलू का परांठा, दो रोटियों के बीच भुने हुए आलू भर कर बनाया और दोपहर को भोजन के साथ बूंदी का रायता विशेष था जिसमें पुदीने की खुशबू आ रही थी. दोपहर को कुछ देर आराम किया, फिर पतिदेव ने दार्जलिंग ग्रीन टी पिलाई, छोटी बहन के दिए कारफोर के आलू चिप्स खाए, भाई ने खुबानी, खजूर तथा छिलके वाले काजू पेश किये. वैसे यहाँ के ठंडे वातावरण में ज्यादा भूख नहीं लगती है. हमें अब तक तो कोई विशेष परेशानी नहीं हुई है बस हाथों की अँगुलियों में झुनझुनी सी महसूस हो रही है रह रहकर ! शाम के साढ़े पांच बजने को हैं, धूप बहुत तेज है अब तक.


..और अब रात्रि के साढ़े नौ बजने को हैं. दिन भर आराम करने के बाद हम शाम को लेह शहर देखने गये, लगभग साठ प्रतिशत दुकानें कलात्मक वस्तुओं, पश्मीने व याक के ऊन से बनी शालों आदि की थीं, यानि पर्यटकों के लिए. पुत्र साथ में नहीं आ सका है, उसके लिए दो वस्तुएं खरीदीं. बाजार की कई तस्वीरें भी लीं. एक मठ ‘जौखांग’ भी देखा. जहाँ विभिन्न मुद्राओं में बुद्ध की आकर्षक मूर्तियों से सजा विशाल हॉल था. एक गोल बाजार देखा, तिब्बती लोगों का रिफ्यूजी मार्किट भी कई जगह था. एक रेस्तरां में कहवा पीया. एक तिब्बती वहाँ स्टिक्स से नूडल्स खा रहा था, तभी एक विदेशी लडकी भी आयी, मुस्कुराती हुई, उसने लद्दाख का अभिवादन ‘जूले’ कहा और प्रेम से दुकानदार से मिली. जब तक भोजन आया वह लिखती रही. वह बहुत आकर्षक थी और शांत लग रही थी. जिस दुकान से उपहार लिए, उसका कश्मीरी मालिक भी काफी मिलनसार था. बाजार में सडकें कई जगह टूटी हुई हैं, पुनर्निर्माण का काम चल रहा है. क्षेत्रफल के हिसाब से देखें तो लेह काफी बड़ा है पर पुराना बसा हुआ शहर छोटा सा ही है, तुलना में गाड़ियों की संख्या बहुत ज्यादा है. पूरा लद्दाख क्षेत्र दो जिलों से बना है, लेह था कारगिल. सारसिंग नामका एक वृक्ष यहाँ कई जगह उगते हुए देखा, वनस्पति ज्यादा नहीं है. चारों और खाली पहाड़ हैं और ऊपर बर्फ से ढके श्वेत पहाड़ ! सम्भवतः यह विश्व का सबसे ऊँचा और ठंडा, बसा हुआ प्रदेश है.  

7 टिप्‍पणियां:

  1. वाह अनीता जी अकेले अकेले ......खैर एक ही साँस में पढ़ डाला यात्रा वृतांत यूँ सब कुछ आँखों के सामने से गुजरा जैसे आपके साथ ही हूँ वैसे कभी गई नहीं हूँ कई बार प्रोग्राम बनता है फिर रह जाता है बहुत सुन्दर वर्णन. दिल्ली तो जैसी है वैसी ही है छिलके वाले काजू गोवा कि याद दिला गये और वो चोप स्टिक से चाऊमीन खाने का अपना ही मजा है और परम्परा गत तरीका भी वही है .कहीं कुछ ज्यादा तो नहीं बोल गई मैं . कोई बात अनुचित लगी हो तो उसे लिये क्षमा प्रार्थी हूँ
    आभार

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    1. रचना जी, आपकी यह टिप्पणी तो मुझे प्रेरित कर रही है कि शीघ्र ही आगे की कड़ी पोस्ट करूं...बहुत बहुत आभार इतने मन से पढ़ने के लिए और कमेन्ट लिखने के लिए..इसी तरह उत्साह बढ़ाती रहें...

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  2. आप लेह तक गईं हैं यह जानकर बड़ी उत्सुकता हुई . हालाँकि आपने संक्षिप्त विवरण दिया है ,फिर भी काफी रोचक जानकारियाँ हैं . इन स्थानों के बारे में हमने सिर्फ किताबों में पढ़ा है इसलिये आगे और भी विस्तार से पढ़ना अपेक्षित है . अगली कड़ी का इन्तजार रहेगा .

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    1. गिरिजाजी, आपका भी बहुत बहुत आभार..कल ही अगली कड़ी पोस्ट करूंगी..आपकी प्रतिक्रिया का इंतजार रहेगा

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  3. जी आपने घर बैठे ही लेह के दर्शन करवा दीये .सुंदर वृतांत

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  4. स्वागत व आभार मधुलिका जी अभी पूरे दर्शन नहीं हुए...अभी सफर बाकी है..

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  5. लेह के बारे में बहुत रोचक और जानकारी भरा लेख ... आपकी यात्रा का मजा हम भी ले रहे हैं और सोच रहे हैं की कभी जाना हो तो क्या कुया सोच के जाया जाय ...

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