बुधवार, जुलाई 15

लद्दाख – धरा पर चाँद धरा - भाग २

लद्दाखधरा पर चाँद धरा 

२९ जून

शाम के पौने आठ बजे बजे हैं. हमारी आज की यात्रा पूर्ण हो चुकी है. सुबह पांच बजे नींद खुल गयी, रात को हवा में ऑक्सीजन की कमी का अहसास हुआ सो एक खिड़की खोल दी थी, बाहर हवा तेज थी, उसकी आवाज आती रही. सुबह उठे तो ठंड बढ़ गयी थी. भाई को प्रातः भ्रमण के लिए तैयार देखकर हम भी उसके साथ टहलने गये, यह गेस्ट हाउस हवाई अड्डे के पीछे स्थित है, काफी साफ-सुथरा है और नया बना है. बाहर निकलते ही चारों ओर सलेटी, मटमैले, काले, धूसर पहाड़ और उनके पीछे बर्फ से ढकी चोटियाँ नजर आती हैं. पर्वतों पर विभिन्न आकृतियों के अंकित होने का भ्रम होता है. एक घंटे के भ्रमण काल में हमने चार उड़ानों को हवाई पट्टी पर उतरते देखा, पहाड़ के पीछे से आता हुआ जहाज जब पलों में आगे आकर एक निश्चित स्थान से नीचे उतरता है तो यह दृश्य दर्शनीय होता है. नहा-धोकर ठीक साढ़े आठ बजे हम ग्लास हॉउस के रूप में बने भोजन कक्ष में गये, कुक ने तिकोन पराठों के साथ पनीर की भुज्जी बनाई थी. एक लोकल ड्राइवर दोरजी की इको वैन हमें साठ किमी दूर ‘हेमिस गोम्पा’ में ले गयी. रास्ता विभिन्न दृश्यों को समेटे था. सरसों के छोटे खेत भी दिखे तथा मनाली रोड पर घने वृक्ष भी. जगह-जगह श्वेत शांति स्तूप बने थे. मॉनेस्ट्री एक विशाल चट्टान पर बनी है तथा छह सौ वर्ष पुरानी है. मुख्य हॉल में बुद्ध की एक सुंदर प्रतिमा है तथा दोनों और बैठने के लिए लकड़ी की बेंच तथा मेजें हैं. हमने कुछ देर वहाँ बैठकर ध्यान भी किया, तभी वहाँ बैठा एक लामा शायद तिब्बती या लद्दाखी भाषा में मंत्रजाप करने लगा, वातावरण और भी प्रभावशाली हो गया. दीवारों पर आकर्षक रंगों में विभिन्न दृश्य अंकित किये गये हैं जिसमें भगवान बुद्ध व देवी तारा के चित्र हैं, अवलोकेश्वर के चित्र भी अंकित हैं. कला यहाँ इतनी सहजता से प्रस्तुत की गयी है कि विस्मयकारी प्रतीत होती है. प्रकृति ने जिस तरह अपना खजाना यहाँ लुटाया है उसी के अनुपात में बौद्ध लामाओं ने मठों को सजाया है. मन्दिर के बाहर जंगली गुलाब की एक झाड़ी थी जो फूलों से लदालद भरी थी. मार्ग में भी ऐसी कई झाड़ियाँ दिखीं. एक श्वेत-श्याम पक्षी भी दिखा जो बाद में पता चला मैगपाई था.

हेमिस के बाद हम ‘थिकसे मठ’ देखने गये जो दूर से ही अपनी वास्तुकला के कारण आकर्षित कर रहा था. विशाल चट्टान पर बना छह सौ वर्ष पुराना यह मठ अपने में महान इतिहास व वंश परंपरा छिपाए है. यहाँ बुद्ध की विशाल प्रतिमा है जो पद्मासन में बैठे हैं तथा दोनों हाथों को विशेष ढंग से बनाया गया है. मन्दिर के कक्ष में प्रवेश करते ही कमल की पंखुड़ियों के आकार में उनकी सुन्दर अँगुलियों के दर्शन होते हैं, फिर ऊपर देखें तो चेहरा और नीचे देखने पर पैर नजर आते हैं. एक लामा सामने बैठकर एक बड़े वाद्य से लयबद्ध ध्वनि निकाल रहा था. कुछ देर हम वहाँ रुके फिर नीचे उतरकर संग्रहालय में गये. स्मृति चिह्नों की दुकान से कुछ खरीदारी की.

हमारा अगला पड़ाव था ‘ड्रुक पद्म कारपो स्कूल’ आमिर खान की फिल्म के कारण जिसे अब रैंचो के स्कूल के नाम से भी जानते हैं लोग. वहाँ की एक गाइड लड़की का नाम था दिस्कित जिसका अर्थ है शांति. उसने बताया, स्कूल की आकृति बौद्ध वास्तुकला के आधार पर बनी है. जिसमें विभिन्न विभाग मंडल, वर्ग तथा चाबी के आकार में बनाये गये हैं. इमारत भूकम्प रोधी है और इकोफ्रेंडली भी. प्रकाश की ऊर्जा का उपयोग ही होता है. स्कूल को इन सभी कारणों से सात अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार मिल चुके हैं. हमने वह खिड़की भी देखी जहाँ से ‘थ्री इडियट’ फिल्म में करेंट लगाने वाला सिस्टम काम करता है.

इसके बाद हम ‘शे पैलेस’ देखने गये. वहाँ काफी चढ़ाई थी. लद्दाख का राज परिवार पहले यहाँ रहा करता था. यहाँ भी एक सुंदर बुद्ध मन्दिर है. बुद्ध की प्रतिमा इतनी ही विशाल थी पर उसे सुंदर वस्त्रों से ढका हुआ था. सभी बौद्ध मठों में रंगीन रेशमी वस्त्रों का बहुत उपयोग होता है. रंगों से इन्हें बहुत प्रेम है, यहाँ के पहाड़ बेरंग हैं शायद इसीलिए.

‘सिन्धु नदी के घाट’ पर पहुंच कर मन इतिहास की कई घटनाओं का स्मरण करने लगा. इसी नदी के कारण हमारे देश का नाम हिंदुस्तान पड़ा और हम हिन्दू कहलाये. इसे पार कर कितने ही आक्रमणकारी भारत आये. नदी का बहाव तेज था तथा पानी ठंडा. जल का हाथ से स्पर्श किया उसमें उतरने का सवाल ही नहीं था. सिन्धु घाट दर्शन स्थल पर हर वर्ष उत्सव का आयोजन होता है. दलाई लामा या अन्य कोई लामा आते हैं तो यहीं पर उनका कार्यक्रम व उत्सव भी होता है.
 
हम गेस्ट हॉउस पहुंचे तो सवा दो बजे थे. भोजन कर कुछ देर आराम किया. शाम को पांच बजे चाय पीकर पुनः ड्राइवर को बुलाया. दोरजी शांत स्वभाव का लद्धाखी ड्राइवर है. यहाँ के लोग बौद्ध धर्म को मानने के कारण काफी शांत व प्रसन्न नजर आते हैं, वे मिलन सार हैं, एक जगह एक वृद्ध महिला के साथ, दूसरी जगह एक बच्चे के साथ तथा स्कूल में उस गाइड लड़की के साथ तस्वीर ली, सभी ने ख़ुशी-ख़ुशी हामी भरी. शाम को हम स्पितुक मठ देखने गये उसी के ऊपर काली माँ का मन्दिर था. काफी सीढ़ियाँ चढ़ कर हम ऊपर पहुंचे तो मठ बंद मिला, मन्दिर तक जाने के लिए पुनः चढ़ाई करनी थी, पर मन्दिर का शीतल, शांत वातावरण देखते ही सारी थकान पल भर में ही दूर हो गयी. सभी मूर्तियों के चेहरे रेशमी वस्त्रों से ढके थे पर जितने भी भाग दिखाई दे रहे थे. आश्चर्य जनक थे. काली माँ का ऐसा रूप पहले कभी नहीं देखा था. यमराज और भैरवी की मूर्तियां भी वहाँ थीं.


मन्दिर से उतरकर हम ‘हॉल ऑफ़ फेम’ देखने गये जो सेना द्वारा बनाया गया एक आधुनिक संग्रहालय है. यहाँ विभिन्न युद्धों में भाग लेने वाले सेना के जवानों के चित्र हैं, लद्दाख का नक्शा  है, हथियार हैं. बच्चों के लिए एक एडवेंचर पार्क है. संग्रहालय में हमने काफी समय बिताया. यहाँ के पौधों, पशुओं, पक्षियों के बारे में, यहाँ के लोगों के वस्त्रों, रहन-सहन की जानकारी भी यहाँ मिलती है.  पास ही एक कॉफ़ी शॉप थी. कुछ देर वहाँ बिताकर हम गेस्ट हॉउस लौट आये. रात होते होते हवा काफी तेज चलने लगी. कई तरह की आवाजें आ रही थीं जब सोने गये, काफी देर तक नींद नहीं आई, एयरपोर्ट पर उस दिन सुना था ऊंचाई के कारण होने वाली परेशानियों में नींद न आना भी एक समस्या है. 

4 टिप्‍पणियां:

  1. लद्दाख भ्रमण का बहुत ही सजीव और सुन्दर चित्र खीचा..अनीता जी आप ने बधाई...

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  2. स्वागत व आभार माहेश्वरी जी

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  3. अनीता जी आपने हर स्थान का जीवन्त चित्रण तो किया ही है , स्थानीय शब्दों का अर्थ भी दिया है यह आपकी लेखकीय दृष्टि है .पाठकों को पूर्ण सन्तुष्टि मिलती है . आनन्द आगया . और हाँ आप बहुत खूबसूरत लग रही हैं .

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  4. स्वागत व आभार, गिरिजाजी !

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