सोमवार, जुलाई 20

खुदा यहीं है !


खुदा यहीं है !

नहीं, कहीं नहीं जाना है
कुछ नहीं पाना है
गीत यही गाना है
खुदा यहीं है !
एक कदम भी जो बढ़ाया
एक अरमान भी जो जगाया
एक आँसू भी जो बहाया
झपकाई एक पलक भी
तो दूर निकल जायेंगे  
इतना सूक्ष्म है वह कि
सिवा उसके, उसकी जात में
कुछ भी नहीं है
खुदा यहीं है !
अब कोई गम तो दूर
ख़ुशी की बात भी बेगानी है
अब न कोई फसाना बचा
 न ही कोई कहानी है
वह जो होकर भी नहीं सा लगता है
अजब उसकी हर बयानी है
उसको जाना यह कहना भी
मुनासिब नहीं है
खुदा यहीं है !
अब कोई सफर न कोई मंजिल बाकी
दामन में बस यह एक पल  
और कुछ भी नहीं है
खुदा यहीं है !
नहीं चाहत किसी को समझाने की
 बेबूझ सी इस बात पर
करता कौन यकीं है
खुदा यहीं है !




7 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी लिखी रचना पांच लिंकों का आनन्द में मंगलवार 21 जुलाई 2015 को लिंक की जाएगी............... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा ....धन्यवाद!

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  2. नहीं चाहत किसी को समझाने की
    बेबूझ सी इस बात पर
    करता कौन यकीं है
    खुदा यहीं है !
    ,,,शाश्वत सत्य...बहुत प्रभावी अभिव्यक्ति..

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  3. कैलाश जी व सुशील जी, स्वागत व आभार

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  4. bahut badhiya likha hai...bas ye pankti.ख़ुशी की बात भी बेगानी है..mujhe lagta hai ki aanand hai uski upastiti ka bhaan...

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    1. शारदा जी, अपने सही कहा है आनंद ही उसकी उपस्थिति है पर ख़ुशी और आनंद में थोड़ा फर्क है..

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