शुक्रवार, मई 19

उड़ न पाते हम गगन में



उड़ न पाते हम गगन  में

गुनगुनी सी आग भीतर 
कुनकुन सा मन का पानी, 
एक आशा ऊंघती सी 
रेंगती सी जिन्दगानी !

फिर भला क्यों कर मिलेगा 
तोहफा यह जिन्दगी का, 
इक कशिश ही, तपन गहरी 
पता देगी मंजिलों का !

जो जरा भी कीमती है 
मांगता है दृढ़ इरादे, 
एक ज्वाला हो अकंपित
 पूर्ण होते अटल वादे !

आज थम कर जरा सोचें 
 गर न हों अवरोध पथ में, 
बिन चुनौती, बिना प्रेरक
 उड़ न पाते हम गगन  में !

4 टिप्‍पणियां:

  1. उत्तर
    1. स्वागत व आभार ओंकार जी !

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  2. आज थम कर जरा सोचें
    गर न हों अवरोध पथ में,
    बिन चुनौती, बिना प्रेरक
    उड़ न पाते हम गगन में !
    .....बहुत सुन्दर प्रेरक रचना

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    1. स्वागत व आभार कविता जी !

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