शुक्रवार, मई 11

जीवन कैसे अर्थवान हो




जीवन कैसे अर्थवान हो

इस जीवन का मर्म सिखाने
खुद को खुद से जो मिलवाये,
कर प्रज्वलित अंतर उजास
आत्मकुसुम अनगिनत खिलाये !

माँ बनकर जो सदा साथ है
स्नेह भरा इक स्पर्श पिता का,
अपनों से भी अपना प्रियजन
समाधान दे हर सुख-दुःख का !

जीवन कैसे अर्थवान हो
सेवा के नव द्वार खोलता,
हर पल मन कैसे मुस्काए
सुंदर मनहर सूत्र बोलता !

सृष्टि के संग एक हुआ जो
परम सत्य का रूप बना है,
अंतरयामी,  हर दिल वासी
जग जिसके हित इक सपना है !

सारे जग को मीत बनाया
सहज आत्मा से जुड़ जाता,
करे न भेद जाति, भाषा का
नयनों से ही हाल जानता !

परम मौन ही नित संगी है
छिपे हैं जिसमें राज हजार,
सद्गुरु युग-युग में आता है
भर अंतर में करुणा अपार !


१३ मई को गुरूजी का जन्मदिन है 


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