गुरुवार, मार्च 19

कोरे कागज सा जो मन था

कोरे कागज सा जो मन था 


जब अनजान बना फिरता था 
तब तेरे दीवाने थे हम,  
जब से आना-जाना हुआ है 
बेगाना सा क्यों लगता है !
 
रीत प्रीत की अजब निराली 
सदा अधूरी चाहें दिल की, 
जाने किसकी नजर लगी है 
रस्ता धूमिल सा लगता है !
 
कोरे कागज सा जो मन था 
अति उज्ज्वल शिखर हिमालय का, 
मटमैले दरिया सा बहता 
पथ भूला-भूला लगता है  
 
किन्तु याद इक पावन उर की  
अहर्निश वही याद दिलाती 
एक पुकार उठी जब दिल से 
भावों का निर्झर बहता है  
 
नहीं शुष्क है अंतर गहरा 
गहरे जाकर यदि खंगाले,
किन्तु खड़ा जो प्यासा तट पर 
 जग उसको सूना लगता है !

14 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुंदर सृजन
    सादर

    पढ़ें- कोरोना

    जवाब देंहटाएं
  2. जी नमस्ते,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा शुक्रवार (20-03-2020) को महामारी से महायुद्ध ( चर्चाअंक - 3646 ) पर भी होगी।
    आप भी सादर आमंत्रित हैं।
    *****
    आँचल पाण्डेय

    जवाब देंहटाएं
  3. चाहत जो पास तो है लेकिन उस पर हक़ हमारा नहीं.
    बेहद उम्दा सृजन.

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. सही कहा है आपने, हक जताते ही चाहत गुम जाती है

      हटाएं
  4. बहुत अच्छी प्रस्तुति

    Mere blog par aapka swagat hai.....

    जवाब देंहटाएं
  5. बहुत सुंदर रचना आदरणीया

    जवाब देंहटाएं