भव सागर का कूल किनारा
परम एक था ! निपट अकेला
उपजा जिससे जगत पसारा,
ढूँढ रहा हर कोई जिसमें
भव सागर का कूल किनारा !
दिखता नहीं दूसरा कोई
कितना खोजा युगों-युगों से।
बना जीव वही, वही आत्मा
खुद को ढूँढे है सदियों से !
कैसा आना, कैसा जाना,
बसा हुआ है जो कण-कण में,
कैसे हुआ अनेक एक से
बिना किसी भी उपादान के !
बोध आत्मा का करें किस विधि
कहाँ उस आनंद को पाएँ,
उपजी है जिस स्रोत से सृष्टि
कैसे लौट वहाँ घर जायें !
"बोध आत्मा का करें किस विधि
जवाब देंहटाएंकहाँ उस आनंद को पाएँ,
उपजी है जिस स्रोत से सृष्टि
कैसे लौट वहाँ घर जायें "!
वाह! समस्त जीवन का सार तत्व!!!
स्वागत व आभार आपका!
हटाएंअद्भुत जीवन-दर्शन
जवाब देंहटाएंस्वागत व आभार!
हटाएंवाह्ह अति गहन भाव लिए अत्यंत सारगर्भित अभिव्यक्ति।
जवाब देंहटाएंसादर।
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जी नमस्ते,
आपकी लिखी रचना शुक्रवार १० अप्रैल २०२६ के लिए साझा की गयी है
पांच लिंकों का आनंद पर...
आप भी सादर आमंत्रित हैं।
सादर
धन्यवाद।
बहुत बहुत आभार श्वेता जी!
हटाएंबस चलते जाएँ ..चरैवेति चरैवेति ।
जवाब देंहटाएंअभिनंदन ।
सही कहा है आपने नूपुर जी! स्वागत व आभार!
हटाएंउम्दा
जवाब देंहटाएंस्वागत व आभार!
हटाएंसुंदर
जवाब देंहटाएंस्वागत व आभार!
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