गुरुवार, अप्रैल 9

भव सागर का कूल किनारा

भव सागर का कूल किनारा


 परम एक था ! निपट अकेला 

उपजा जिससे जगत पसारा, 

 ढूँढ रहा हर कोई जिसमें 

भव सागर का कूल किनारा ! 


 दिखता नहीं दूसरा कोई

कितना खोजा युगों-युगों से। 

 बना जीव वही, वही आत्मा 

खुद को ढूँढे है सदियों से !


कैसा आना, कैसा जाना, 

 बसा हुआ है जो कण-कण में, 

कैसे हुआ अनेक एक से 

बिना किसी भी उपादान के !


 बोध आत्मा का करें किस विधि

कहाँ उस आनंद को पाएँ, 

  उपजी है जिस स्रोत से सृष्टि

कैसे लौट वहाँ घर जायें !

 

12 टिप्‍पणियां:

  1. "बोध आत्मा का करें किस विधि

    कहाँ उस आनंद को पाएँ,

    उपजी है जिस स्रोत से सृष्टि

    कैसे लौट वहाँ घर जायें "!
    वाह! समस्त जीवन का सार तत्व!!!

    जवाब देंहटाएं
  2. वाह्ह अति गहन भाव लिए अत्यंत सारगर्भित अभिव्यक्ति।
    सादर।
    -------
    जी नमस्ते,
    आपकी लिखी रचना शुक्रवार १० अप्रैल २०२६ के लिए साझा की गयी है
    पांच लिंकों का आनंद पर...
    आप भी सादर आमंत्रित हैं।
    सादर
    धन्यवाद।

    जवाब देंहटाएं
  3. बस चलते जाएँ ..चरैवेति चरैवेति ।

    अभिनंदन ।

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. सही कहा है आपने नूपुर जी! स्वागत व आभार!

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