चंदा की आभा में कैसा यह हास जगा
मानस की घाटी में, श्रद्धा का बीज गिरा
मनीषा की डाली पर, शांति का पुष्प उगा,
अंतर की सुरभि से, जीवन का ढंग महका
रिस-रिस कर प्रेम बहा, अधरों से हास पगा !
कण-कण में आस जगी, नयन में उजास भरा
हुलसा है पोर-पोर, उर मनहर गीत जगा,
बाहर इक लय बिखरी, जीवन संगीत बहा
कदमों में थिरकन भर, गह्वर में नृत्य जगा !
मुस्काई हर धड़कन, लहराया जब यौवन
अपने ही आंगन में, प्रियतम का द्वार खुला,
लहरों सी बन पुलकन, उसकी ही बात कहे
बिन बोले सब कह दे, अद्भुत यह राग उठा !
हँसता है हर पल वह, सूरज की किरणों में
चंदा की आभा में, कैसा यह हास जगा,
पल-पल वह सँग अपने, सुंदर यह भाग जगा
देखो यह मस्ती का, भीतर है फाग जगा !
युग-युग से प्यासी थी, धरती का भाग उगा
सरसी बगिया मन की, जीवन में तोष जगा,
वह है, वह अपना है, रह-रह कहता कोई
सोया था जो कब से, मंजर वह आज जगा !
बहुत सुंदर अभिव्यक्ति
जवाब देंहटाएंWaaaaah
जवाब देंहटाएंसरसी बगिया मन की, जीवन में तोष जगा
सुन्दर रचना ❤️