मंगलवार, मई 5

एक रागिनी है मस्ती की

एक रागिनी है मस्ती की


इक ही धुन बजती धड़कन में

इक ही राग बसा कण-कण में,

एक ही मंजिल, एक  रस्ता

इक ही प्यास शेष जीवन में !


इक ही धुन वह निज हस्ती की

एक रागिनी है मस्ती की,

एक पुकार सुनाई देती

दूर पर्वतों की बस्ती की !


मस्त हुआ जाये ज्यों नदिया

पंछी जैसे उड़ते गाते,

उड़ते मेघा संग हवा के

बेसुध छौने दौड़ लगाते !


खुल जायें जैसे नीलगगन 

उड़ती जैसे मुक्त पवन है,

क्यों दीवारों का कैदी है 

उर परम प्रीत की लगे लगन  !


एक अजब सा खेल चल रहा

लुकाछिपी है खुद की खुद से,

ख़ुद ही कहता ढूँढो मुझको

ख़ुद ही बंध दूर है खुद से ! 


 

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