एक रागिनी है मस्ती की
इक ही धुन बजती धड़कन में
इक ही राग बसा कण-कण में,
एक ही मंजिल, एक रस्ता
इक ही प्यास शेष जीवन में !
इक ही धुन वह निज हस्ती की
एक रागिनी है मस्ती की,
एक पुकार सुनाई देती
दूर पर्वतों की बस्ती की !
मस्त हुआ जाये ज्यों नदिया
पंछी जैसे उड़ते गाते,
उड़ते मेघा संग हवा के
बेसुध छौने दौड़ लगाते !
खुल जायें जैसे नीलगगन
उड़ती जैसे मुक्त पवन है,
क्यों दीवारों का कैदी है
उर परम प्रीत की लगे लगन !
एक अजब सा खेल चल रहा
लुकाछिपी है खुद की खुद से,
ख़ुद ही कहता ढूँढो मुझको
ख़ुद ही बंध दूर है खुद से !
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