बुधवार, अक्टूबर 7

मानो उसने चुरा लिया उर

मानो उसने चुरा लिया उर 



खोज सही पर दिशा ग़लत है 

इक तलाश हर दिल में जारी, 

  भरे हवा को ज्यों मुट्ठी में

व्यर्थ जा रही कोशिश सारी !


चाहत जिसकी ‘तू’ से करते 

‘मैं’ के भीतर वह कोष छिपा, 

घने आवरण छाये मन पर 

नित चिदाकाश में सूर्य उगा !


मची खलबली जिस अभाव से 

संग लिए उसको उर फिरता, 

एक विचित्र खेल ज्यों चलता

स्वयं जाने क्यों स्वयं छलता ! 


सम्राटों सा गढ़ा उसी ने 

ब्रह्मांडों का परम नियंता, 

कातर नज़रों से क्यों ताके 

ख़ुद मालिक अपनी क़िस्मत का !


चाह सत्य की प्यास बनी जब 

तड़पाती अंतर को भीतर, 

मानो उसने चुरा लिया उर 

रह जाता बस वही चिरंतर ! 


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