रविवार, सितंबर 18

जैसे कोई घर लौटा हो

जैसे कोई घर लौटा हो


जगत पराया सा लगता था 

जब थी तुझसे पहचान नहीं, 

तेरी आँखों को पहचाना 

 सबमें  झांक रहा था तू ही !


अब कहाँ कोई है दूसरा 

जैसे कोई घर लौटा हो, 

कतरे-कतरे से वाक़िफ़ है 

जिसने अपना मन देखा हो !


जीवन का प्रसाद पाएगा 

आज यहीं इस पल में जी ले, 

दिल की धड़कन में जो गूँजे 

गीत बनाकर उसको पी ले ! 


शावक के नयनों से झाँके 

फूलों के नीरव झुरमुट में, 

तारों की टिमटिम जिससे है 

भ्रम के उस अनुपम संपुट से !


एक वही तो सदा पुकारे 

प्रेम लुटाकर पोषित करता, 

रग-रग से वाक़िफ़ है सबकी 

अनजाना सा बन कर रहता !


16 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी लिखी रचना सोमवार 19 सितम्बर ,2022 को
    पांच लिंकों का आनंद पर... साझा की गई है
    आप भी सादर आमंत्रित हैं।
    सादर
    धन्यवाद।

    संगीता स्वरूप

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  2. जी नमस्ते ,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल सोमवार(१९-०९ -२०२२ ) को 'क़लमकारों! यूँ बुरा न मानें आप तो बस बहाना हैं'(चर्चा अंक -४५५६) पर भी होगी।
    आप भी सादर आमंत्रित है।
    सादर

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  3. जीवन का प्रसाद सा ही अनुपम भाव। पा लिया हो जैसे। अति सुन्दर कृति।

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  4. प्रेम लुटाकर पोषित करता
    वाह!!!
    अद्भुत अप्रतिम।

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    उत्तर
    1. उसकी कृपा सदा बनी रहे, स्वागत व आभार सुधा जी!

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  5. सचमुच एक वही तो है जो सभी जीवों को निःस्वार्थ प्रेम करता है।
    परमपिता के प्रति असीम श्रद्धा प्रकट करती सुंदर कृति।
    प्रणाम
    सादर।

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    उत्तर
    1. शुभकामनाएँ! स्वागत व आभार श्वेता जी!

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  6. अदृश्य परम सत्ता की अनूठी अभ्यर्थना प्रिय अनीता जी।सच में वही है जो सबके भीतर स्पंदन का मूल है।

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  7. सही कहा है आपने, स्वागत व आभार रेणु जी!

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  8. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  9. एक वही तो सदा पुकारे
    प्रेम लुटाकर पोषित करता,
    रग-रग से वाक़िफ़ है सबकी
    अनजाना सा बन कर रहता !
    बहुत सुंदर भाव । उस अलौकिक परम शक्ति को नमन, जिसने हम सबको और इस संसार को बनाया है । हमेशा की तरह सुंदर.. मनन और चिंतन से निकली रचना ।

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