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शनिवार, मार्च 10

जैसे कोई...




जैसे कोई...

जैसे कोई बच्चा आँखें बंद कर ले
फिर कहे, “माँ तुम कहाँ चली गयीं ?”
तो माँ हँस देती है

जैसे कोई बड़ा
नाक पर चश्मा चढ़ाये हो
और खोजता हो उसी को
तो साथी हँस देता है

वैसे ही हम उसी में रहते हैं
और पूछते हैं तुम कहाँ हो
तो वह भी हँस देता होगा खिलखिलाकर
और तभी बरस उठती हैं बदलियाँ
झलक दिखाती हैं बिजलियाँ
महक उठती हैं फूलों की घाटियाँ
दौड़ पड़ती हैं सागर की तरफ
बलखाती नदियाँ
चमचमा उठती हैं
हिमखंडों से भरी उन्नत चोटियाँ......